संवैधानिक भारत में विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,ध
खाली मस्तिष्क में विकृति सुझती है और मनुष्य कभी-कभी व्यर्थ के कार्य करके समय पूरा करता है .भारतवर्ष में ब्राम्हण वर्ग ऐसा ही एक समूह रहा है जिसके पास कोई कम नहीं रहा .ब्राम्हणों ने चार वर्णों की स्थापना की ,ब्राम्हण-क्षत्रिय-वैश्य और शुद्र .क्षत्रिय को हथियार पकड़ा दिया .गद्दी और ब्राम्हणों की रक्षा और सैन्य कार्य सौंप दिया.वह शासक भी था और देश का रखवाला भी .राजपाट,जागीरदारी रक्षा के समंध में क्षत्रिय को व्यस्त कर दिया .जब राज्य में शांति हुई तो मंत्री होकर उसके एक राजा को दुसरे राजा से लड़ा दिया .वस्तुतः उसे व्यस्त रखा.वैश्य को पेट का प्रबंध दिया.वैश्य को अर्थ व्यवस्था का स्वामी बना दिया .वह व्यापार ,उद्योग और कृषि का मालिक हो गया .सदैव पैसा गिनने में लगा रहा और ब्राम्हणों के चक्कर में फंसा कर उसे भी व्यस्त बना दिया .चौथा वर्ण शुद्र वर्ग जो शारीरिक श्रम करता था ,दिन भर कृषि उद्योग में श्रम किया करता था .शाम को हारा थका पड़ा रहा .परिणामतः क्षत्रिय-वैश्य और शुद्र सदैव अपने ही कार्य में व्यस्त रहे.ब्राम्हण के पास कोई काम नहीं था.पढना,लिखना उसका काम था .वह भी अपने ही वर्ग को, शेष समय में वह खाली था.उसके सामने उसकी जीविका का प्रश्न भी था अतः उसने अनेक ऐसी अर्थहीन नियम परंपरायें और आस्थाओं का सृजन किया जिससे समाज तो अंधकार में डूबा परंतु उसने अपने सन्मान और पूजा जीविका का प्रबंध पूरा कर लिया .मूलनिवासियों को तमाम व्रत ,पर्व,त्यौहार ,मेला,संस्कार आदि निश्चित मान्यताओं और विशासों में जकड दिया की हर समाज को किसी व्यक्ति को इनमे डूबे रहना आवश्यक था और ब्राम्हण के लिए हर क्षण सन्मान ,धन,मर्यादा संग्रह की उपलब्धि थी.इसीलिए उसने अनेक व्रत पर्व और त्योहारों को गढ़ा .
ब्राम्हणों के व्रत पर्व और त्योहारों की रचना मन्तव्य को भावनात्मक स्थिति को समझने से निम्न तथ्य स्पष्ट है .
१) हिंदुओं के व्रत पर्व और त्योहार ब्राम्हणों ने अपनी भोजन व्यवस्था और दान चढवा द्वारा सभी आर्थिक आवश्यकताओं और वासनाओं की पूर्ति को स्थाई साधन की दृष्टी से सुजीत किया.
२) हिदुओं के व्रत पर्व और त्यौहार ब्राम्हणों ने अपनी मान्यता,पूजा सन्मान,प्रतिष्ठा कराने हेतु रचे.
३) भरतीय बहुजन समाज को अंध विश्वास पाखंड भय और धोके के जल में फंसायें रखकर उसे चेतना शून्य बनाने और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए निर्मित किये.
४) हिंदुओं के व्रत,पर्व और त्योहारों की ब्राम्हणों ने आर्य(ब्राम्हण) और अनार्य(बहुजन) वे संघर्ष और कार्यों द्वारा अनार्यों के दमन अपमान और विनाश की स्मृति को ताजा रखने के लिए प्रतिक स्वरुप रचना की .
५) आर्यों के देवी देवता अवतार महर्षियों,महापुरुषों के दुष्कार्य,पाप,अत्याचारों,व
६) हिदुओं के व्रत पर्व और त्यौहार ब्राम्हणों द्वारा शूद्रों का शोषण करने की निति से बनाये गए.
७) हिदुओं के व्रत पर्व और त्यौहार मेले और संस्कार ब्राम्हणों ने इसीलिए पैदा किये ताकि समाज के अन्य वर्ग इनके निर्वाह में धन का व्यय करते रहे और संचय करके ण धनी बनने पाये तथा धन के अभाव में स्वतंत्र बुद्धि का विकास न कर सके और ब्राम्हण की अंध व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति को न सोच सके.
८) हिदुओं के व्रत पर्व और त्यौहार ब्राम्हणों ने इस आशय से सुजीत किये ताकि समाज हर क्षण भयग्रस्त बना रहे और बंधनों का उलंघन करके मानव सुख जनित तर्क पर आधारित नविन आस्थाओं और विश्वासों को जन्म न दे सकें.
२५०० वर्ष से भी जादा वर्ष हो गए जब संपूर्ण SC,ST,OBC समाज इन अंध विश्वास एवं पाखंड पूर्ण व्रत पर्व त्यौहार आस्था और विश्वासों में जकड़ा बुद्धि की दासता में पिसता रहा और आर्थिक शोषण का शिकार बना रहा .दूसरी और एक चालक धूर्त वर्ग उनको विवशता से लाभ उठाता रहा और आज भी उठाता चला आ रहा है.
प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी घटना से जुड़ा हुआ है और फिर त्यौहार पर उस घटना को ताजा किया जाता है .प्रायः यह घटना आर्यों(ब्राम्हणों) द्वारा अनार्य(बहुजन) दमन(हुई हार) का प्रतिक होती है .भारत के व्रतपर्व और त्यौहार की विशेषता यह है की यहाँ हर त्यौहार जातिगत है .शुद्र वर्ण के वे ही त्यौहार है जो शुद्र दलन के यादगार के रूप में मनाये जाते हैं ,जैसे होलिका,रावण,कुंभकरण ,अहिरावण ,हिरण्यकश्यप ,हिरनाक्ष्य के वध,बलि का राज,जैसे 6 डिसेम्बर ब्राम्हणों का शौर्य दिवस (बाबरी मस्जिद गिराने के बाद),महाराष्ट्र में गुडीपाड़वा जो बहुजंनो के राजा संभाजी महाराज के किये गए खून के बाद ब्राम्हणों के नए वर्ष के रूप में मनाया जाता है.जूठा कारन बताया जाता है की राम अयोध्या लौटे थे लेकिन उसे महाराष्ट्र छोड़कर और कही नहीं मनाया जाता . आदि घटनाओं की स्मृति स्वरुप मनाये जाने वाले त्यौहार है .इन त्योहारों का एक ही आशय रहा है की इनके मनाने से शुद्र वर्ग अपने इन महान राजाओं और वीर योद्धाओं की दुराचारी दृष्ट समझने लगे और उनकी हत्या और दमन की यद् कर ब्राम्हण धर्माचारियों के विरुद्ध विद्रोह न कर सके दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है की आज का शुद्र अपने ही पूर्वजों की हत्या और दमन के अवसरों को उत्सवों के रूप में बड़े उल्लास के साध में मना रहा है.शुद्र को अपने गौरव पूर्ण प्राचीन इतिहास की खोज करना चाहिए.ब्राम्हणों के कुछ त्यौहार जयंतियो के रूप में मनाये जाते हैं ,जैसे रामनवमी,कृष्ण जन्माष्टमी,हनुमान जयंती आदि.ये वे त्यौहार है जो उनके जन्म की ख़ुशी में मनाये जाते है .जिन्होंने शुद्र अनार्यो की हत्या की .
ब्राम्हणों ने मूलनिवासियों के साथ छल ,कपट,कूटनीति अपनाकर हत्या करके राजपाट ले लिया. ऐसे सभी भारत के मूलनिवासी राजाओं की हत्या के दिन एवम् वो ऐतिहासिक क्षण है जिसको आर्य ब्राम्हण जश्न,जलसा,खुशियाँ मनाते हैं.
हमारे नागवंशीय पूर्वज बहुत बुद्धिमान,शुर,पराक्रमी और सुख संपन्न थे.इनके साथ सीधे लड़ने की ताकद विदेशी यूरेशियन आर्यों ब्राम्हणों में कदापि नहीं थी .इसीलिए उन्होंने वराह अवतार,नरसिंह अवतार,मत्स्य अवतार (विष्णु अवतार) अलग अलग नाम देकर हमारे महान रक्षक वीर योद्धा राजाओं का खात्मा कर दिया और रक्षक योद्धाओं को राक्षस करार दिया.बिना श्रम अच्छी जिंदगी गुजारने के लिये जन्म से लेकर मृत्यु तक कर्मकांड,पूजापाठ अलग अलग विधियों में आर्य भटोने फंसा दिया.
कुछ काल्पनिक बातों का भय फैलाकर साथ में स्वर्ग-नर्क-मोक्ष-भगवान प्राप्ति का मार्ग दिखाकर विदेशी आर्य ब्राम्हण दलाल बन बैठा है .इस प्रचलित प्रथाओं का सहारा लेकर ब्राम्हण वर्ग बहुजनों की लुट करने के लिए फुसलाता रहता है.इन तमाम वजह से हमारा बहुजन भाई मानसिक गुलंबन गया है .
इन सब षड्यंत्रों का पर्दाफाश करके बहुजन समाज को उजाले में लाना है,क्योंकि जब तक बहुजनों का अंग स्वर्ग-नर्क,पितृमोक्ष,भाग्
जम्बूदीप भारत के मूलनिवासी भूमिपुत्र रक्षक जनो की वर्तमान में (२७ नोव्हेंबर १९४९,२६ जनवरी १९५०)( SC=15%, ST=7.5%,धार्मिक अल्पसंख्यांक 10.5% ,OBC =52% total 85% बहुजन .) इत्यादि नाम से संकलित करके भारतीय संविधान में 6,००० जाती और ७५,००० उपजाति को एक श्रुंखला में संकलित किया गया .
आज़ादी और संविधानिक दिन के पहले से और आज तक अत्याचारी क्रूर आर्य वंशीय (भटजी,लालजी,शेटजी) लोगो का शासन प्रशासन ,मनी ,मिडिया ,माफिया,हायकोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट ,रेडियो,टी.व्ही.,अख़बार,भा
भारत में विकृत संस्कृति की अमानवीय,अहितकारी परंपरा रीतिरिवाज व्रत वैकल्य,सण पर्व विकृति विदेशी आर्यों ने सत्य असत्य का मेलमिलाप करके प्रचालन किया है .जो एक बीमारी की तरह वैदिक आर्य ब्राम्हणवाद मनुवाद फैला है और इस बीमारी से हमारा मूलनिवासी बुरी तरह मारा जा रहा है .इसी भाव के साथ चार्वाक,बुद्ध,अनेक संत गुरु और पिछले कुछ साल में छत्रपति शिवराय महाराज,संभाजी महाराज,महात्मा फुले,शाहू महाराज ,पेरियार, अन्नाभाऊ साठे ,बिरसा मुंडा,डॉ.पंजाबराव देशमुख ,विश्वरत्न बाबासाहेब आंबेडकर इनका जबरदस्त साहित्य भंडार जो हमें लक्ष प्राप्ति के लिये एक निति मार्ग प्रदान करता है .बहुजन समाज में आवश्यकता नुसार साहित्य,जानकारी देकर समस्या मुक्त समाज व्यवस्था बनायीं जा सकती है .
वर्तमान में भारत में प्रमुख रूपसे मनाये जाने वाले त्यौहार इस प्रकार है =१.दीपावली २.दशहरा ३.होली ४.रक्षा बंधन ५.गणेश चतुर्थी 6.राम नवमी ७.कृष्ण जन्माष्टमी ८.महाशिवरात्रि ९.गणगौर 10.तीज ११.बसंत पंचमी १२.ओणम १३.पोंगल १४.बुद्ध पूर्णिमा १५.नवरात्री स्थापना १६.करवा चौथ आदि .
इन त्योहारों हा मूल स्वरुप क्या था ?? इसे अभी तक बहुत कम लोग जानते है .पेहले इन त्योहारों को मनाने के लिए कोई यज्ञ,हवन,पूजा,पाठ आदि नहीं होते थे ,न ही किसी समंधित देवी-देवता को संतुष्ट करने के लिए कोई घी,तेल,मिठाई आदि चढ़ाये जाते थे ,ण ही इनको मनाने का ब्राम्हणवादियों द्वारा कोई मुहूर्त निकला जाता था .किन्तु आज कल ब्राम्हाणवाद के प्रभाव से किसान लोग भी ढकोसलों में फंस गए हैं .वे भी नारिलयों की जटा को तोड़कर चढाते हैं ,जो सफाचट सिरों पर बंधी चोटी का का प्रतिक है .बुरी आत्माओं से बचने के लिए कभी-कभी इन टूटे हुये नारियलों और कटे हुये नींबू आदि को गलियों के कानों पर,तिराहों पर फेंक दिए जाते हैं किन्तु मूलनिवासियों का कोई त्यौहार ऐसा नहीं है जिसमे खाने की वस्तुओं को यों व्यर्थ ही फेंक दिया जाता हो .
इसकी कतिपय जानकारी हमें इन त्योहारों के स्वरुप पर दृष्टी डालने से मिल जाएगी.इन त्योहारों का मूल स्वरुप बदलने और उस पर ब्राम्हणी मुलामा चढ़ाने के पीछे ब्राम्हणों की जो ओंछी मानसिकता थी,जो षड्यंत्र था ,उसका अब मूलनिवासियों की कलम से भंडाफोड़ हो चूका है,जिसकी जानकारी भारत के सभी मूलनिवासियों को होना आवश्यक है .
ये आक्रमणकारी आर्य ब्राम्हण एक ओर भारत में मूलनिवासियों नागों द्रविड़ों और बौद्धों के गौरवशाली इतिहास को नष्ट करना चाहते थे,इतिहास प्रसिद्ध उनके नायकों का चरित्र हनन करके उन्हें रावण और राक्षस बनाकर बदनाम करना चाहते थे,उन्हें विध्वंसक सिद्ध करना चाहते थे ताकि आम लोगों में उनकी छवि बिघड जाये और वे अपने ऐतिहासिक नायको के कल्याणकारी तथा वास्तविक चरित्र को भूल जाये .उनके अपने ही लोग उनके विरोधी हो जाये .दूसरी और उनकी और से कपोल कल्पना पर आधारित देवी-देवताओं के झूठे गुणगान करके उन्हें मूलनिवासी समाज में प्रस्थापित करना चाहते थे.उन्हें ब्राम्हणी व्यवस्था के रक्षक बनाकर,उनके झूठे चमत्कारों को बार-बार प्रचार करके झूठे को सही साबित करके अपनी पूजा पाठ की,कर्मकांड की दुकाने चला कर बिना मेहनत किये अपने पेट भराई का इंतजाम करना चाहते थे .
अपनी इस पेट भराई के लिए उन्होंने यहाँ के मूलनिवासीयों को भाग्य-भगवान,पाप-पुण्य ,आत्मा-परमात्मा,पुनर्जन्म ,भुत-प्रेत,स्वर्ग-नरक,यज्ञ
इन आर्य ब्राम्हण लुटेरों ने मूलनिवासियों का सब कुछ लुट लिया और उन्हें लाचार,दिन-हिन् की जिंदगी जीने को विवश कर दिया .उनके शिक्षा,संपत्ति जैसे सभी मानवीय अधिकार छीन कर उन्हें पशु तुल्य जीवन जीने को मजबूर कर दिया .उन्हें गावं से बाहर गन्दगी में लाचार और दिन-हिन् स्थिति में रहने और मुर्दा मांस खाकर अपना जीवन बसर करने को विवश कर दिया.आज जो आप थोडा बहोत अच्छा जीवन जी रहे हैं,वो डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर के बनाये हुये संविधान की दी हुई देंन है.क्यूँ के संविधान के वजह से मनुस्मृति के कायदों को बड़ी रूकावट पैदा हो गयी.
ये सभि काम उनके द्वारा रचे गए एक षड़यंत्र के तहत किये गए. वह षड़यंत्र था –यहाँ के मूलनिवासियों को हमेशा के लिए ,दीर्घकाल के लिए मानसिक गुलाम और अशिक्षित बनाये रखने का ताकि उनकी सत्ता बरक़रार रहे और यहाँ का मूलनिवासी कभी शिक्षित होकर उनके षड़यंत्र को समझ ना सके,उनकी सत्ता को चुनौती न दे सकें.
शिक्षा,संपति जैसे मानवधिकारों से वंचित रहने पर भी यहाँ के मूलनिवासी लोगों को संत कबीर ,संत रविदास, शिवाजी महाराज, संभाजी महाराज, शाहू महाराज, बाबासाहेब आंबेडकर जैसे परिवर्तनवादी विचारों के महापुरुष मिले और वे इस अन्यायकारक ब्राम्हणी समाज व्यवस्था के विरोध में खड़े हुये. उनके स्वर मुखरित होने लगे. आम जनता उनके विचारों को समझने लगी ,उनसे जुड़ने लगी तो उनकी हत्यायें करवा दी गयी. यही उनका सच्चा इतिहास है ,जिसे उजागर करना होगा.
ऐसे कई संत नामदेव,तुकाराम,गाडगे महाराज,पीपा,गोगा,आदि इस मूलनिवासी समाज में पैदा हुये जिन्होंने इस ब्राम्हणी व्यवस्था का विरोध किया तो सभी की इन ब्राम्हणों ने हत्याये करवा दी और उन्हें प्रकृति विरुद्ध अवतार बना कर मूलनिवासी समाज के सामने परोस दिया.हवा में ,आकाश में किसी का जन्म हो नहीं सकता .जन्म तो माँ की कोख से होता है ,पिता के वीर्य से होता है .किन्तु वह इनकी चालाकियों –नालायकियों के गर्त में इतना गहरा डूब चूका है की आज अपने मौलिक संवैधानिक मानवीय अधिकारों की बहाली के ६० वर्षो बाद भी ,लाख हाँथ-पांव मारने के बाद भी वह उनसे उबार नहीं पाया है .आज भी उसके दुल्हों को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जा रहा है.आज भी उनको मंदिरों में जानेपर पिटाई हो जाती है .हेण्डपंप चुने पर नंगा करके उसे मारा जाता है इ. यह सब क्या है ??? यही ब्राम्हणी षड़यंत्र है .यही ब्राम्हण धर्म (हिंदू धर्म) है ,जो एक इन्सान को दुसरे इन्सान से छूने की इजाजत नहीं देता .इसके छु लेने से वह अपवित्र हो जाता है .यह कैसा धर्म है जो दुसरे इन्सान को छूने से मन करता है ??? जो समाज को जोड़ने के बजाये तोड़ने का काम करता है .
हिन्दुवाद दुसरे धर्मो से काफी अलग है .उसने अपने देवी-देवताओं की निर्मिती भी एक भिन्न ढंग से कर रखी है.सभी देवी-देवताओं को एक बेहद निर्लज्ज दलित विरोधी रूप में संस्थानिकृत,संशोधिकृत किया गया है.हिन्दुवाद यह दावा करता है की बहुजन हिंदू है लेकिन उसके देवी –देवता खुले रूप से मूलनिवासी बहुजन विरोधी है .परिणामस्वरूप,इस धर्म की प्रकृति शुरू से ही निरंकुश(फासिस्ट)रही है .इस बात का अनुभव केवल बहुजन ही कर सकते हैं .वे छल-कपट और शोषण को व्यवस्था का हिस्सा मानते है.वे उसे अपनी वैयक्तिक चेतना का हिस्सा नहीं मानते हैं.लेकिन भारत के संदर्भ में सच्चाई यही है की हरेक ऊँची जाती का व्यक्ति इस शोषण और छलकपट में हिस्सा लेता है .वह ऐसी संस्कृतियों की रचना करने और उनको चिरस्थायी बनाये रखने में मदत करता है .जैसे क्षत्रिय और वैश्य इस चातुवर्ण व्यवस्था को हर हाल में मजबूती देने का कम करते हैं. हिदू देवताओं की रचना करना और उनको चिरस्थायी बनाये रखना इस संस्कृति की एक बड़ी उपलब्धि है .बहुजन विद्रोहों को देखकर विद्रोह की चेतना का दमन करने के लिए भारत की ब्राम्हाणवादी शक्तियों ने अपने देवताओं का आव्हान किया है.........जब तक कोई इन बातों की गहराई से छानबीन नहीं करेगा तब तक सच्चाई के प्रति कोई बहुजनों के दिमागों को नहीं खोल सकता है .
(*************ब्राम्हणों ने राम के इसी अमानवीय एवं अनैतिक स्वरुप को आदर्श एवं पुरुषोत्तम कह कर संबोधित किया था ,क्योंकि वैदिक-वांडमय (ब्राम्हणी) की मान्यताओं और मापदंड के अनुसार इस प्रकार के दुर्गुण रखने वाला व्यक्ति ही आदर्श पुरुष मन जाता है .उदहारण के लिए अपनी और चारों भाइयों की पत्नी द्रौपदी को जुए में हारने वाला व्यक्ति युधिष्ठिर धर्मराज,अपनी पत्नी को व्यभिचार के लिए बेचने वाले हरिश्चंद्र को महादानी या दानवीर,श्रीकृष्ण चरित्रहीन एवं १६,००० पत्नियां रखने वाला सोलह कलाओं से परिपूर्ण विष्णु का अवतार भगवान आदर्श पुरुष कहा जाता है .इसी प्रकार व्यभिचारिणी अहिल्या,द्रौपदी,तारा,कुंती
THIS IS JUST AN INTRODUCTION OF BRAMHANVAD .
हमारा सभी बहुजनों से अनुरोध है की ,ये २५०० का सालो के बहुजनों पे होते आ रही ब्राम्हणी गुलामी का १००% सच्चा इतिहास है. ये आपको सिर्फ एक किताब या फेसबुक की पोस्ट से समझ में नहीं आ सकता .बहुतसे हिंदुत्ववादी(ब्राम्हण,क्षत
