एड. कमलेश कुमार मित्रा
मुख्य सचिव
धर्मचक्र कल्याण मित्र
ग्राम मियाॅपुर, पोस्ट कोडरा सरैयां
तह0 शाहाबाद, जिला हरदोई, उत्तर प्रदेश।
मो0-9335122064
विनाश मंत्री
महिला एवम् बाल विकास मंत्री के व्यान पर मुझे हंसी आयी जब उन्होने कहा कि किशोर अपराधियो की उम्र घटाकर 16 वर्ष की जानी चाहिये। न जाने उनकी किशोरो से कौन सी व्यक्तिगत दुष्मनी रही होगी ? जो उन्होने इस प्रकार का व्यान दिया। किन्तु एक मंत्री के लिहाज से उन्होने जब इस आशय का बिल संसद में पेश किया तो मुझे लगा कि अब पानी सिर से ऊपर हो गया है, क्यो न इस विषय पर खुलकर चर्चा कर ली जाये । कुछ महिला संगठन और महिला आयोग की अध्यक्ष भी किशोरो के प्रति दुर्भावना का द्रष्टिकोण रखती हैं और अनाप-शनाप व्यान वाजी करती हैं। डरा-सहमा पुरूष चुप है या यह कहिये उसका समय गुजर गया है, तो समय क्यों खराव करे। फिर भी कुछ बहादुर लोग हुए जिन्होने धारा के विपरीत सत्य को सामने रखा, विना किसी दुर्भावना या भय के उस कड़वे सत्य से साक्षात्कार कराना मेरा उद्देश्य है।
माननीय अटल जी के दो व्यान ‘‘कुआरा हूॅ कोरा नही’’ तथा ‘‘जवानी में भूले हो जाती हैं‘‘ और अपने मुलायम जी तो युवाओ के साथ ही खड़े नजर आते हैं। 16 साल से 90 साल के युवाओ का बलात्कार और छेड़-छाड़ में लिप्त होना, कानून का विषय नही मनोविज्ञान का विषय है, ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरे कूप में ही भांग पड़ी है, और जब पूरे कूप में भांग पड़ी है तो भांगेड़ियो को ठीक करने की बजाये कूप के पानी को साफ किया जाने चाहिये।
नारी स्वतन्त्रता के नाम पर, नारी की नग्नता को प्रोत्साहित करना कूप में भांग डालना है। जब कोई नारी नृत्यकीयों की पोशाक पहनकर अपने सभी कामुक अंगो का प्रदर्शन करते हुए विचरण करेगी तो सीटियाॅं भी वजेगी और कमेंट भी कसे जयेंगे यदि अभद्र प्रतिक्रिया होगी तो प्रतिशोध (रेप या गैंग-रेप) भी लिया जायेगा। यदि कोई ऐसा नही करता है तो आचार्य रजनीश की भाषा में कहूॅगा, वह व्यक्ति अवनार्मल है, उसे डाक्टर को दिखाया जाना चाहिये, इसीलिए आचार्य रजनीश ने अपने साधको को अनिवार्य रूप से ऐसी पोशाक पहनने का निर्देश दिया है जो साधना के अनुरूप है तथा अंगो प्रदर्शन नही करती है।
साड़ी-व्लाऊज या सलवार-सूट जिस रूप में आज महिलायें पहनती हैं वह मर्दो को बालात्कार करने के लिये दी जाने वाली चुनौती है जिसे साहसी मर्द स्वीकार करते हैं क्योकि इस धरती पर बहुत से प्राणी हैं जो एक संभोग के वाद ही मर जाते हैं पर अपने दिल की हशरत पूरी कर जाते हैं। साड़ी-व्लऊज, सलवार-सूट या अन्य पोशाक पहनकर अपने उरेज, नितम्व और पीठ का प्रदर्शन करना नृत्यकीयों की पोशाक थी कुलीन घरानो की नही, जो महिलाये काॅलर-दार वस्त्र नही पहनती और अपने अंगो का प्रदर्शन करती हैं, उनके अंगो की तारीफ की ही जानी चाहिए, इसे अश्लीलता या छेड़-छाड़ समझना कनून की भयंकर भूल हैै। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि महिलायें अश्लील पोशाक पहनकर कामन-प्लेस पर 16 साल से 90 साल तक के युवाओ को बालात्कार के लिए उकसाती हैं फिर भी कानून उसे अश्लीलता नही मानता, दूसरी तरफ सत्य कह दें तो वह छेड़-छाड और अश्लीलता हो जाता है ।
पुरूषो में होने वाला रोग ‘‘धातु‘‘ ‘‘स्वपनदोष‘‘ अैार ‘‘मधुमेय‘‘ के लिये महिलाओ द्वारा फैलायी जाने वाली अश्लीलता(नग्नता) जिम्मेदार है। जितनी बड़ी मात्रा में ‘‘धातु‘‘, ‘‘स्वपनदोष‘‘ औार ‘‘मधुमेय‘‘ के रोगी पाये जाते हैं उसकी तुलना में छेड़-छाड और बालात्कार के मामले बहुत कम हैं। बालात्कार की सजा जितनी कठोर होती जयेेगी, बालात्कार उतना ही विभत्ष होता जायेगा। आज कल अखबार में जब बालात्कार की कोई घटना मैं पढता हूॅ तो मुझे बालात्कार जैसा कुछ दिखायी नहीं देता हैं ऐसा लगता है जैसे किसी ने अपनी किसी पुरानी रंजिश का वदला लिया हो । सेक्स एक अनिवार्य आवश्यकता है स्वस्थय मनुष्य के लिए निठारी कांड में नौकर को सजा और मालिक का मजा यह ठीक नही है इससे तो सेक्स बाजार का सूचकांक और उछलेगा किन्तु इस विषय पर कानून मौन है तो जज साहब क्यांे बोले ? जबकि सर्व विदित है कि सेक्स संक्रामक है इसीलिए पोर्नोग्राफी, अश्लील फिल्म और साहित्य का बाजार खुब फल-फूल रहा है। इस में काम करने वाली बालाओं की कोई धर-पकड़ नही होती। ऐसी बालायें कामन-प्लेस पर कामुक पोशाको को पहन कर ग्रहकों को फंसाती हैं और पांडेया जैसे लोग इन बालाओं के साथ मजें लेते हैं। हिन्दुस्तान में काॅल-गर्ल का बाजार खुब फल-फूल रहा है। किन्तु मुर्ख कुलीन घराने के सदस्य अपने घरो की महिलाओं को काॅल-गर्ल और नृत्यकीयांे की पोशाक पहनाकार गौर्वान्वित महसूस करते हैं किन्तु यदि कोई पुरूष उनके घर की महिलाओं के प्रति आकर्षित हो जाये तो झगड़ा और मार-पीट करते हैं। क्या महिलाओं को कामन-प्लेस पर कामुक पोशाकेे पहन कर अंग प्रर्दशन करने के लिये दंड़ित नही किया जाना चाहिए ? इस देश का कानून भेद-भाव कर सकता है पर प्रकृति भेद-भाव नही करती है, बालात्कार के लिए उकसाने वाली महिलाआंे का या उनकी वहन, बेटी का बालात्कार होगा ही यह प्रकृति द्वारा दी जाने वाली सजा है जिसे किसी भी देश का कोई भी कानून रोक नही सकता है। पुरूष की पिस्तौल भरी गयी है तो चलेगी भी, शिकार कौन होगा (कोई स्त्री ही) ?
मुर्ख महिलायें जिन्हे पाक-शास्त्र का कोई वोध नही है वह एक तरफ स्वयं तथा अपनी वहन और बेटी को सेक्स-बम बनाकर बाजार के सामने बालात्कार के लिए प्रस्तुत करती हैं। तो दूसरी तरफ घर के कुवारे पुरूषों को ताॅमसिक आहार देकर बालात्कार करने के लिए मनसिक रूप से तैयार करती हैं। सरकार शराव के ठेके देकर, होटलो और ढाबों पर ताॅमसिक भोजन परोशने की छूट देकर बालात्कार के लिये सेज सजा रही है तो बालात्कार होना ही चाहिए। उस 16 साल के मासूम को तो यह पता ही नही है कि उसके चित में बालात्कार का बिचार कहाॅ से आ रहा है ।
साड़ी-व्लाऊज, सलवार-सूट के अलावा अन्य विदेशी पोशाकें जहाॅ से आयी हैं, वहाॅं के लोग या तो उच्च कुलीन हैं अर्थात वह अपने घर की महिलाओ को सेक्स जैसी मामूली चीज के लिए पराये कुल में नही भेजते, एक दूसरे की सेक्स आवश्यकता घर में ही पूरी कर देते हैं इसलिए बालात्कार जैसी कोई समस्या ही नही है, वह कपड़े पहने या न पहने कोई फर्क नहीं पड़ता । दूसरी तरफ कुलहीन लोग हैं उन देशों में सार्वजनिक शौचालय से ज्यादा सार्वजनिक वैश्यालय हैं जिन पर वहाॅं की सरकार टेक्स लेती है वहाॅ सेक्स एक उद्योग है इसलिए वहाॅ के लोग कुछ भी पहने या न पहने कोई फर्क नही पड़ता । किन्तु भारत में इसका फर्क पड़ता है। कोई माॅ, वहन, बेटी, पड़ोसन, सहकर्मी, पड़ोसन की बेटी या अन्य महिला अंग प्रदर्शन वाली पोशाक पहनेगी तो पुरूष आकर्षित होगा ही, पुरूष के आकर्षित होने का मतलब है कि उसका काम अंग सक्रिय हो चुका है, जिसकी तृप्ति न करायी जाये तों उस व्यक्ति में ‘‘धातु‘‘ ‘‘स्वपनदोष‘‘, ‘‘मधुमेय‘‘, ’’शीघ्रपतन’’, चिड़-चिड़ापन और नशाखोरी जैसी समस्यें जन्म लेंगी। युवाओ में मार-पीट करना, नशाखोरी करना, ‘‘धृात‘‘,‘‘मधुमेय‘‘, ’’शीघ्रपतन’’ का रोग अतृप्त काम-इच्छा की प्रतिफल है। मंत्री महोदया को इस ओर भी ध्यान देना चाहिये ।
16 साल का लड़का या लड़की शारीरिक में हो रहे परिवर्तन को अच्छे से देखना और समझना चाहते हैं। बजाये उनकी इस समझ को विकसित करने के किशोर और किशोरियों में एक दूसरे के प्रति नफरत फैलायी जा रही हैं। यदि 4 बच्चों की माॅ किसी कुवारे लड़के के साथ भाग जाती है तो लड़के को जेल भेज दिया जाता है और उस महिला को पति के साथ भेज दिया जाता है, और जब 16 साल की लड़की किसी लड़के के साथ भाग जाती है तो भी लड़के को जेल भेज दिया जाता है और लड़की को माॅ-बाप के साथ भेज दिया जाता है । जब ऐसे अन्याय पूर्ण कानून होंगे तो किशोर अपराधियों की संख्या बढ्रेगी ही ! जब आंटियाॅ अपनी गोरी पीठ का प्रदर्शन करेंगी तो किशोर देखेगे ही ! जब लड़कियाॅ अपने वक्ष को नोटिस वोर्ड़ बनायेंगी तो वो पढा भी जायेगा ! जो पहली वार नोटिस वोड पढेगे वे देर तक पढेगें निश्चय ही वे किशोर होंगें ! जो ऐसी पोशाकें पहनाते हैं वे भी पढेगें लेकिन वे उस्ताद हैं थोड़ा जल्दी पढ लेंगें और किसी को पता भी नही चलेगा।
क््रमशः...........................................................