Tuesday, July 29, 2025

रियल स्टेट में पैसा क्यों लगाया जाए

  रियल स्टेट में पैसा क्यों लगाया जाए?


भ्राता जी,


**सामाजिक न्याय, आवास नीति, और आर्थिक समानता: दलित-शोषित समुदायों के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण**


भ्राता जी, मैं उन नीतियों का कड़ा विरोध करता हूँ जो भ्रष्टाचार से अर्जित धन को बढ़ावा देती हैं। कुछ लोग अनैतिक तरीकों से कमाई गई पूंजी से एक से अधिक मकान खरीदते हैं, उन्हें अपने बच्चों, रिश्तेदारों, यहाँ तक कि कुत्ते-बिल्ली के नाम पर रजिस्टर करते हैं, और फिर किराए पर चढ़ाकर लाभ कमाते हैं। यह व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक असमानता को गहराती है, खासकर दलित और शोषित समुदायों को और पीछे धकेलती है। मैं ऐसी नीतियों के खिलाफ हूँ।


खास तौर पर, सरकार का ट्रिपल पी मॉडल (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) इस असमानता को और बढ़ाता है। यह मॉडल पूंजीपतियों को और अधिक समृद्ध करने के लिए बनाया गया है, न कि दलितों और शोषितों के कल्याण के लिए। अंबेडकरवादी कब समझेंगे कि यह नीति सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध है? यह मॉडल रियल एस्टेट और अन्य क्षेत्रों में पूंजीपतियों के हितों को प्राथमिकता देता है, जिससे सामान्य व्यक्ति, विशेष रूप से कमजोर वर्ग, मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।


मेरा मानना है कि सरकार को शहरी क्षेत्रों में आवास की नीति को पूरी तरह बदल देना चाहिए। शहरी क्षेत्र घोषित होते ही, वहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरकार द्वारा किफायती आवास की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। कोई भी निजी व्यक्ति किसी भवन को किराए पर न दे सके। सभी भवनों का स्वामित्व सरकार के पास होना चाहिए, और शहरी आबादी, विशेष रूप से दलित और शोषित समुदायों, को समान आवास उपलब्ध कराना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। भारतीय संविधान की मूल भावना आर्थिक समानता की है, और जीने के लिए सभी को समान आवास का अधिकार होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपनी निजी क्षमता से मकान खरीदना चाहे, तो उसे केवल अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अनुमति मिलनी चाहिए, न कि आश्रित संतानों या निवेश के लिए।


आज गलत सरकारी आर्थिक नीतियों, विशेष रूप से ट्रिपल पी मॉडल के कारण, रियल एस्टेट क्षेत्र में मकानों की कीमतें इतनी अधिक हैं कि 15,000 रुपये प्रति माह वेतन पाने वाला व्यक्ति अपने परिवार के लिए उपयुक्त मकान खरीदने में असमर्थ है। यह स्थिति भारतीय संविधान की आर्थिक समानता की भावना के खिलाफ है। रियल एस्टेट द्वारा निर्धारित ये कीमतें केवल धनवानों को लाभ पहुँचाती हैं, जिससे सामान्य व्यक्ति, विशेष रूप से दलित और शोषित समुदाय, आवास के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।


मैं इस बात से भी चिंतित हूँ कि संपत्ति में निवेश करने वाले लोग वास्तविक सुख से वंचित रहते हैं। उदाहरण के लिए, श्री भगवान दास के तीन लड़कों ने शाहजहाँपुर में तीन अलग-अलग मकान बनाए। इस प्रक्रिया में उन्होंने भारतीय संस्कृति के जॉइंट फैमिली सिस्टम को नष्ट कर दिया। इसका कारण यह है कि संस्कृत शिक्षा देने वाला कोई गुरु उनके पास नहीं था। संस्कृत शिक्षा तो केवल धर्मगुरु ही दे सकते हैं, क्योंकि विद्यालय और महाविद्यालय केवल साक्षरता, औद्योगिक शिक्षा, या रोजगारपरक शिक्षा प्रदान करते हैं। ये संस्थाएँ जीवन जीने की कला नहीं सिखातीं। विश्व के महान पंडित श्री बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम चरणों में धर्म के आगे सिर झुकाया, क्योंकि उन्हें पता था कि जीवन जीने की कला धार्मिक शिक्षा से ही मिलती है। कानूनी शिक्षा केवल लड़ाई के दाँव-पेंच सिखाती है, लेकिन सच्चा जीवन जीने का मार्ग धर्म की शिक्षा में निहित है।


रियल एस्टेट में निवेश केवल उच्च जातियों के धनपतियों को और समृद्ध करता है, न कि दलित और शोषित समाज को मजबूत बनाता। मैं ऐसी योजनाओं में पैसा लगाकर पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने के पक्ष में नहीं हूँ। यदि मुझे देना ही है, तो मैं उन लोगों की मदद करना पसंद करूँगा जिनकी आजीविका केवल किराए पर निर्भर है, न कि रियल एस्टेट के पूंजीपतियों की। उदाहरण के रूप में, आईईआरटी के संघर्ष में श्री सरदार ने अपने बेटे की कोई आर्थिक मदद नहीं की और मरते दम तक मकान बनाते रहे, लेकिन आज उस मकान में कोई दीया जलाने वाला नहीं है। यह दर्शाता है कि संपत्ति संचय से न तो सच्चा सुख मिलता है और न ही सामाजिक योगदान होता है।


इसी तरह, श्री राम मामा की सोच सामाजिक उत्थान की थी, लेकिन उनके सुपुत्र श्री राकेश ने गलत निर्णय लेकर उनकी संपत्ति श्री गुप्ता खानदान को सौंप दी। उनके बच्चे अपनी पैतृक जड़ों से कट गए और प्रतिरोध विवाह के कारण चांडाल कहलाए। उनमें अभी भी अहंकार बाकी है। यदि श्री मोदी सरकार अगले 10 वर्षों तक रही, तो ऐसी प्रवृत्तियाँ और दमनकारी नीतियाँ दलित और शोषित समुदायों को और कमजोर कर सकती हैं।


मैं यह भी देखता हूँ कि मुसलमानों की दुर्दशा आज एक चेतावनी है। यदि हम सावधान नहीं रहे, तो अगला निशाना दलित और शोषित समुदाय होंगे। भारत में अधिकांश दलित और अछूत जातियाँ, चाहे उनका जातिगत नाम कुछ भी हो, चांडाल संस्कृति से जुड़ी हैं। ऐतिहासिक रूप से इन्हें पिता की संपत्ति और शासन में अधिकार से वंचित रखा गया। आज समाज को जागरूक करना अति आवश्यक है, और यह एक सामाजिक कार्य है। दलित समाज के आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को इस दिशा में सोचना होगा और उन लोगों का सहयोग करना होगा जो सामाजिक न्याय के लिए कार्य कर रहे हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो हजारों वर्षों की गुलामी का इतिहास फिर से दोहराया जाएगा, और श्री बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का संघर्ष व्यर्थ चला जाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री बाबा साहब ने अपने चार बच्चों की कुर्बानी देकर दलित समाज को इस मुकाम तक पहुँचाया है।


मेरी कार्य की दिशा अलग है। मेरे ऊपर कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है, और मैं अपना शेष जीवन सामाजिक उत्थान, विशेष रूप से दलित और शोषित समुदायों के सशक्तिकरण के लिए समर्पित करना चाहता हूँ। मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है, और कौन जाने जीवन की कब शाम हो जाए। मैं मकान बनाने जैसे कार्यों में क्यों उलझूँ? मेरे लिए सामाजिक जिम्मेदारी सर्वोपरि है। मैं ₹1,00,000 जमा करने के बाद रियल एस्टेट के शेयरधारकों के लिए अपना खून-पसीना नहीं बहाऊँगा। मेरा रास्ता सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता का है, और मैं इस दिशा में कार्य करना चाहता हूँ।


भ्राता जी, यदि कोई मेरे इस कार्य में सहयोग करना चाहे, तो उनका हृदय से स्वागत है। आपने मेरे विचारों को समझने और मुझसे संवाद करने का प्रयास किया, इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ। मेरा लक्ष्य अपने बचे हुए समय में दलित और शोषित समुदायों के लिए कार्य करना है, ताकि श्री बाबा साहब का सपना साकार हो सके।


 अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा @9335122064