पाठकों और ब्लोगर बन्धुवों ! मैं आज एक ऐसे पत्र को आप तक पहुँचाने जा रहा
हूँ जो कि एक पत्रकार ने लिखा था. उसने अपने पत्र में गोधरा में हुए काण्ड
का सच बयान किया है. मैं उस पत्र में लिखित अंश और विश्लेषण को आप तक
पहुँचाना चाहता हूँ.
साबरमती एक्सप्रेस में जो दु:खदायक काण्ड हुआ वह क्या था? और उस दिन क्या क्या घटित हुआ? कितनी सच्चाई हमारी मिडिया ने दिखाई, कितना
सच छान कर झूठ का लबेदा ओढे हम तक पहुंचा? आईये एक पत्रकार की ज़ुबानी
सुनते हैं..... (Mr. Anil Soni and Neelam Soni (reporter of Gujarat
Samachar) Soni's mobile number: 0-9825038152. Resident number 02672
(code) 43153)
साबरमती एक्सप्रेस का दुखदाई कांड सुबह ७:३० पर
गोधरा स्टेशन के एक किलोमीटर दूर हुआ, की सच्चाई मैं आप तक पहुँचाना चाहता
हूँ. साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर S-6 और दो दूसरी बोगियों में विश्व
हिन्दू परिषद् (VHP) के कार-सेवक यात्रा कर रहे थे. दुखदाई कांड की असल वजह
ये कार-सेवक ही थे, जो उन बोगियों में सफ़र कर रहे थे. जो कहानी आप तक
पहुंचाई गयी है वह सच्चाई से कोसों दूर हैं, असल कहानी जो कि सच है वह अलग
ही है.
यह वास्तविकता शुरू होती है गोधरा से ७०-७५ किलोमीटर दूर
दाहोद नामक स्टेशन से. समय था ५:३०-६:०० ऍएम्, ट्रेन दाहोद स्टेशन पहुंचती
है. ये कार-सेवक उस स्टेशन पर चाय-नाश्ता करने के उद्देश्य से टी-स्टाल पर
जाते हैं. किसी बात पर कार-सेवकों और टी-स्टाल के बीच विवाद हो गया और उन
कार-सेवकों ने दूकान में तोड़-फोड़ कर दी. फिर वे अपने बोगी में वापस चले
गए... इस वाकिये की एक एन-सी.आर. दूकान मालिक ने स्थानीय पुलिस में भी की
थी.
अब ट्रेन गोधरा स्टेशन पर पहुंचती है और समय हो रहा होता है
७:००-७:१५ AM. वहां सभी के सभी कार-सेवक ट्रेन से उतर कर स्टेशन पर एक छोटे
से चाय की स्टाल पर जा कर स्नैक्स आदि लेते हैं; उस स्टाल को एक बुढा
मुसलमान व्यक्ति चला रहा होता है. उस दूकान में एक छोटा लड़का भी हेल्पर
बतौर काम कर रहा था. कार-सेवकों ने जानबूझ कर मुसलमान दूकानदार से बहसबाजी
शुरू कर दी और बहस करते करते ही उसे पीट डाला. उन कार-सेवकों ने उस बूढे
मुसलमान की दाढ़ी भी पकड़ कर खींची और उसे मारा. वे कार-सेवक जोर जोर से एक
नारा भी दे रहे थे
"मंदिर का निर्माण करो, बाबर की औलाद को बाहर करो"
बाबर की औलाद से उनका मुराद मुसलमान ही थे.
शोर-शराबा सुन कर उस बूढे की सोलह साल की एक लड़की वहां पर आ गयी और अपने
बाप को बचाने की नाकाम कोशिश करने लगी. वह उन ज़ालिम कार-सेवकों से दया की
भीख मांग रही थी और कह रही थी कि उसके बाप को छोड़ दीजिये, जिसको वे
कार-सेवक अभी भी मार रहे.
उन ज़ालिमों ने उस बूढे को तो छोड़ दिया
लेकिन उस लड़की को पकड़ लिया और अपने बोगी (S-6) में ले गए और अन्दर से
दरवाज़ा बंद कर लिया. उस लड़की को अपने साथ ज़बरदस्ती क्यूँ ले गए थे; यह
बताने की आवश्यकता नहीं है.
उधर बुढा उनसे अपनी बेटी को छोड़ देने
की गुहार लगा रहा था. लेकिन उसकी एक न चली. अब ट्रेन धीमे धीमे आगे बढ़ना
शुरू हो गयी लेकिन ट्रेन के रफ़्तार पकड़ने से पहले ही वह बुढा मुसलमान
दूकानदार ट्रेन की आखिरी बोगी (गार्ड के पहले वाली) में चढ़ जाता है और
ट्रेन की चेन को पुल कर देता है. अब ट्रेन पूरी तरह से रुक जाती है और यह
सब करते करते गोधरा स्टेशन लगभग एक १ किलोमीटर पीछे हो चुका होता है.
तभी २ नव-युवक वहां आ जाते हैं माज़रा समझ कर खिड़की के बाहर से उन
कार-सेवकों से उस लड़की को छोड़ देने के लिए कहते हैं. शोर-शराबा काफी बढ़
चुका होता है बोगी के आस-पास लोग इक्कट्ठे हो जाते हैं; उस भीड़ में कुछ
लड़के और औरतें भी होती हैं जो बाहर से ही उन कार-सेवकों से उस लड़की को
छोड़ने का दबाव बनाने लगते हैं. भीड़ काफी गुस्से में होती जा रही थी और
लड़की को वापस कर देने की मांग अब गुस्से में तब्दील होती जा रही थी.
लेकिन बजाये लड़की को वापस देने के, वे ज़ालिम (VHP) के कार-सेवक लोगों ने
बोगी की खिड़कियाँ ही बंद कर दीं. यह क्रिया भीड़ के गुस्से में आग में घी
का सा काम किया और उस भीड में से कुछ लोगों ने बोगी पर पत्थर फेंकना शुरू
कर दिया.
बोगी संख्या एस छह (S-6) के दोनों तरफ की बोगियों में भी
कार सेवक थे. उन कार-सेवकों के पास भी बैनर थे जिसमें लम्बे लम्बे डंडे
लगे थे. वे कार-सेवक अपने बैनर्स और डंडों के साथ लड़की को बचाने आई भीड़
पर ही पिल पड़े और बैनर के डंडों से भीड़ पर हमला बोल दिया. अब भीड़ का
गुस्सा पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुका था. भीड़ में से ही कुछ लोगों ने
पास के ही एक गैराज से (garages Signal Fadia) से डीज़ल और पेट्रोल आदि ले
आये और बोगी को जलाने लगे.
जैसा कि कथित रिपोर्ट में यह कहा गया
कि पेट्रोल आदि को प्री-प्लांड पेट्रोल पम्प से लाया गया; बिलकुल ही
बे-बुनियाद है. यह प्रतिक्रिया अचानक भीड़ ने की न कि पहले से प्लान करके.
भीड़ लड़की को छुडाने की कोशिश कर रही थी लेकिन कार-सेवक उग्र से उग्रतर
होते जा रहे थे. वे (स्वभावत: वैसा ही करने लगे जैसा कि वे अयोध्या में कर
चुके थे) जानते थे कि यह हिन्दुस्तान है यहाँ केवल जय श्री राम कह कर जो
आतंक फैलाया जा सकता है वह गोली बंदूक से भी ज़्यादा भयानक होता है.
यह घटना सुनकर वहां के स्थानीय वीएचपी (VHP) कार्यकर्ताओं ने उस गैराज में
(Signal Fadia) में आग लगा दी और पास के ही एक इलाके 'शेहरा भगाड़' (गोधरा
का ही एक स्थान) में स्थित एक मस्जिद को भी जला डाला.
देर से
पहुंची पुलिस को सच कहानी का पता तो नहीं चल सका लेकिन भीड़ द्वारा जलाई
गयी सरकारी बोगी को साक्षात् देख पुलिस का गुस्सा स्थानीय लोगों पर उतारा
और पुलिस ने स्थानीय लोगों को गिरफ़्तार कर लिया.
पुलिस अपना पल्ला
झाड़ने के तहत गोधरा के मेयर श्री अहमद हुसैन कलोता को इस घटना का
ज़िम्मेदार ठहरा दिया. श्री अहमद हुसैन भारतीय कांग्रेस के मेंबर भी है उर
एक वकील भी.
यह पूरी जानकारी वहीँ के स्थानीय लोगों और विश्वसनीय
लोगों से बातचीत पर आधारित भी है. मैं इस स्रोत के मुख्य पात्र श्री अनिल
सोनी जी (मोबाइल # 0-9825038152. घर का नंबर 02672 'कोड' 43153, ऑफिस नंबर :
43152,) का शुक्गुज़ार हूँ जिन्होंने इस पूरी घटना का सच्चा वृतांत
पहुँचाया.
वी एच पी (विश्व हिन्दू परिषद्) ने फिर ऐसा चक्र रचा कि
देश को १०० साल से भी ज़्यादा पीछे धकेल दिया. मैं यह कहने से कोई गुरेज़
नहीं करता हूँ कि भारत में वी एच पी (विश्व हिन्दू परिषद्) या संघ या बजरंज
दल या भाजपा आदि धुर-कट्टरपंथी ताक़तों ने एक बार नहीं कई बार देश को
साम्प्रदायिकता की आग में धकेला है और उसकी रोटी सेंकी है. ऐस नहीं है कि
जिसकी रोटी इन्होने सेंकी उन्हें कोई फायेदा पहुंचा हो, वे केवल देश की उन
भोली भाली जनता का ब्रेन वश कर देते हैं जो अंध-विश्वास और आस्था के लिए
कुछ भी कर देती है. क्या इन शैतानों के इस कृत्य को कोई रोक सकता है और
इनके इस कृत्य की सज़ा तो केवल उन मासूम लोगों को ही भुगतनी पड़ती है जिनका
उससे कोई लेना देना भी नहीं है.
क्या ऐसा ही होता रहेगा कभी अयोध्या, कभी गोधरा कभी गुजरात........आखिर कब तक !!!