यह पुर्णतः सत्य है की (homo-sapiens) आधुनिक मानव की उत्पति 1,30,000 (1 लाख, तीस-हजार ) साल पूर्व अफ्रीका में हुयी है, जैसा की विज्ञान ने कब का सिद्ध कर दिया है |
कालांतर में आज से 1,00,000 लाख (एक लाख साल) पूर्व वहां से मानव का भिन्न-भिन्न कबीलों के रूप में भिन्न-भिन्न 'द्वीपों' और 'महाद्वीपों' की और अलगाव होता रहा |
कालांतर में आज से 1,00,000 लाख (एक लाख साल) पूर्व वहां से मानव का भिन्न-भिन्न कबीलों के रूप में भिन्न-भिन्न 'द्वीपों' और 'महाद्वीपों' की और अलगाव होता रहा |
अर्थात आज से तकरीबन 1,00,000 साल (एक लाख साल पुर्व) से अफ़्रीकी मानव अपनी खान-पान व अन्य परिस्थितियों के अनुसार विश्व की विभिन्न जगहों की और पलायन करता गया !
जैसा की यहीं तथ्य मोजुदा वेबसाइटों पर भी हैं ; साथ में 'राजस्थान राज्य पाठ्य-पुस्तक मण्डल की कक्षा -6' की 'सामाजिक-विज्ञान' में भी यही तथ्य स्पष्ट कर दिया है |
हमारे 'भारत' में मानव का 67,000 साल (सतसठ हजार) पूर्व आना बताया गया है |
अर्थात अफ्रीका से निकलने के बाद विश्व में सर्वप्रथम हम हीं ने अपना स्थायी-आवास बनाकर 'सभ्यता' और 'संस्कृति' विकसित की |
अर्थात अफ्रीका से निकलने के बाद विश्व में सर्वप्रथम हम हीं ने अपना स्थायी-आवास बनाकर 'सभ्यता' और 'संस्कृति' विकसित की |
मगर विदेशी-घुम्मकड़ 'आर्य' तो हमारे यहाँ आने के बहुत लम्बे अरसे बाद (हमारे द्वारा भारत में हमारी महान संस्कृति और सभ्यताएँ विकसित करने के बहुत काल बाद) आक्रमणकारी बनकर आये, और संसार की हमारी सर्वश्रेष्ट सभ्यताएं 'सिन्धु-घाटी', 'हड्ड्पा' के साथ ना-ना प्रकार की 'बौद्धिक और योगिक-सभ्यताएं' नष्ट कर दी और मानव-मानव को हजारों जातियों में बांटकर ये विदेशी ब्राहमणी-आर्य यहाँ के शासक बन गये |
हमारे अपने बने-बनाएं घर में चोर-लुटेरों के रूप में घुस भी गये और मूलनिवासियों को ही आपस में विभाजित कर हजारों जातियाँ में बांटकर,छुआछुत की भावना पैदा करने के साथ में करोड़ों भगवानों को पैदा करके वर्ग-विशेष को श्रेष्ठ बना दिया तो मूलनिवासियों को गुलाम बनाकर सभ्यता के प्रकाश से हजारों सालों तक हमें ही दूर कर दिया !
हमारी विश्प्रसिद्द योगिक और बौद्धिक-संस्कृति का सत्यानाश किया वो अलग !
हमारी विश्प्रसिद्द योगिक और बौद्धिक-संस्कृति का सत्यानाश किया वो अलग !
यहाँ प्रश्न यह भी है की जब 'भारत' में मानव का आगमन ही आज से 67,000 साल (सतसठ हजार) पूर्व हुआ तो फिर इन 'ब्राहमणवादियों' के अनुसार रामायण का समय 'त्रेतायुग' का माना जाता है।
ब्राहमणवादियों ने कालगणना के अनुसार समय को चार युगों में बाँटा गया है-
ब्राहमणवादियों ने कालगणना के अनुसार समय को चार युगों में बाँटा गया है-
१-सतयुग, २-त्रेतायुग, ३-द्वापर युग एवं, ४-कलियुग।
-सतयुग- १७,२८,००० वर्ष का
-त्रेता युग- १२,९६,००० वर्ष का
-द्वापर- ८,६४,००० वर्ष का
और...
-एक कलियुग- ४,३२,००० वर्ष का
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अर्थात = ४३,२०,००० ( तैयालिस लाख, बीस हजार वर्ष)
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अर्थात = ४३,२०,००० ( तैयालिस लाख, बीस हजार वर्ष)
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माना की इनके अनुसार कलयुग अभी चल रहा है, अतः यदि कलयुग की आयु घटा भी दे तो भी शेष = ३८, ८८,००० ( अड़तीस लाख, अट्ठासी हजार वर्ष) होते है |
अर्थात ३८,८८,००० ( अड़तीस लाख, अट्ठासी हजार वर्ष) साल कलयुग से पूर्व बीत चुके हैं |
अर्थात ३८,८८,००० ( अड़तीस लाख, अट्ठासी हजार वर्ष) साल कलयुग से पूर्व बीत चुके हैं |
यदि 'रामायण' के "राम" की कालगणना करें तो = २१,६०,००० + कलयुग के जितने साल बीतें है वे अलग !
इस प्रकार "राम' को पैदा हुए २१,६०,००० लाख साल (इक्कीस लाख साथ हजार साल) बीत चुके हैं !
इस प्रकार "राम' को पैदा हुए २१,६०,००० लाख साल (इक्कीस लाख साथ हजार साल) बीत चुके हैं !
(लगभग यही बात 'ब्राहमणवादी' भी कहते है | उन 'वैदिक-धर्मियों के अनुसार 'राम' का जन्म एवं 'रामसेतु' का निर्माण आज से २१,१५,१०८ (21 लाख 15 हजार 108 वर्ष) पहले हुआ था।)
जबकि उस काल में बिना 'रामसेतु' के भारत से "श्रीलंका' में आ-जा सकते थे, चूँकि दोनों देश आपस में मिले हुए (एक ही अंग) थे !
और तो और जब आधुनिक मानव ही 1,30,000 साल पूर्व पैदा हुआ, फिर इनकी वैदिक (ब्राहमणी) गणना तो किसी भी दृष्टिकोण से खरी नहीं उतरती हैं !!!
और तो और जब आधुनिक मानव ही 1,30,000 साल पूर्व पैदा हुआ, फिर इनकी वैदिक (ब्राहमणी) गणना तो किसी भी दृष्टिकोण से खरी नहीं उतरती हैं !!!
-मगर ये 'ब्राहमणी' लोग क्यों नहीं समझतें है की इनके (हिन्दुओं/ब्राहमणी) भगवान मात्र-कल्पना है !
जो सारे भगवान इन्ही ब्राहमणों ने अपने स्वार्थवश ही पैदा किये है !
जो सारे भगवान इन्ही ब्राहमणों ने अपने स्वार्थवश ही पैदा किये है !
अवलोकनार्थ मानचित्र संलग्न है .....| जिसमे 'अफ़्रीकी' मानव का विभिन्न 'महाद्वीपों' की और पलायन और समय दर्शाया गया है |
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