Monday, August 18, 2025

मायावती की नीति की आलोचना

 श्रीमान जी, (mob.9588034526) आपके छोटे से प्रश्न का बड़ा सा उत्तर दे रहा हूं 🙏


*मायावती की मनुवादी नीतियों और बसपा के पतन का हृदयविदारक विश्लेषण: दलित समाज को सत्य की पुकार*


मैं, एक दलित समाज का चिंतक, यह हृदयविदारक पुकार लेकर आपके सामने हूँ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जो बाबा साहेब अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम जी के सपनों का प्रतीक थी, मायावती के नेतृत्व में मनुवादी ब्राह्मणों के कब्जे में आ चुकी है। उनकी आत्मकेंद्रित सत्ता की लालसा और मनुवादी ताकतों को खुश करने की नीतियों ने दलित हितों, अधिकारों, कल्याण और आर्थिक समानता को कुचल दिया। पिछले 15 सालों में मायावती ने दलितों के सम्मान के लिए कोई सड़क पर संघर्ष नहीं किया। सत्ता में रहते हुए भी उन्होंने मनुवादी ब्राह्मणों को लाभ दिया, जिससे दलितों पर अत्याचार बढ़े। उनकी मनुवादी नीतियों ने दलितों को चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (ASP) बनाने पर मजबूर किया। यह लेख मायावती की मनुवादी नीतियों पर कड़ा प्रहार करता है, जो सिद्ध करता है कि बसपा अब दलितों की नहीं, मनुवादी ब्राह्मणों की शुभचिंतक है। दलित उन्हें वोट क्यों दें, जब कोई गारंटी नहीं कि सत्ता में आने पर वे मनुवादी ब्राह्मणों के तलवे चाटेंगी?


### 1. सत्ता की लालसा: दलितों का विश्वासघात

मायावती की CM और PM बनने की लालसा ने दलित हितों को हाशिए पर धकेल दिया। उन्होंने सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों, को टिकट और मंत्रिपद देकर मनुवादी ताकतों को मजबूत किया। सत्ता में आने पर मायावती मनुवादी ब्राह्मणों के तलवे चाटती हैं, और वे उनके तलवे चाटकर सत्ता का सुख लेते हैं, जबकि दलितों के हाथ कुछ नहीं आता। इससे दलितों में निराशा बढ़ी, और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में ASP का गठन हुआ। यह दलित वोटों का बंटवारा है, जिसने BJP की “फूट डालो, राज करो” नीति को सफल बनाया। दलित उन्हें वोट क्यों दें, जब उनकी नीतियाँ केवल मनुवादी ब्राह्मणों के लिए हैं और कोई गारंटी नहीं कि सत्ता में आने पर वे दलितों को लाभ देंगी?


### 2. मनुवादी कब्जा: कांशीराम की विरासत पर प्रहार

जैसे महर्षि दयानंद सरस्वती की हत्या कर उनके सुधार हथियाए गए, वैसे ही कांशीराम जी की अप्रत्यक्ष हत्या के बाद मनुवादी ब्राह्मणों ने बसपा पर कब्जा कर लिया। सतीश चंद्र मिश्रा को कानून मंत्री बनाकर मायावती ने दलितों को ठगा। सत्ता में रहते हुए, मिश्रा के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था की कुर्सी ने दलितों पर अत्याचार को प्रत्यक्ष देखा, जैसे ललिता कुमारी केस में पुलिस की मनमानी। मायावती ने इसकी अनदेखी की, क्योंकि उनकी निष्ठा मनुवादी ब्राह्मणों के प्रति थी। मनुवादी ब्राह्मण मायावती को “बहन जी” कहकर उनके अहंकार को बढ़ाते हैं, ताकि दलित समाज टुकड़ों में बंटे।


### 3. चंद्रशेखर की उपेक्षा: दलित एकता पर हमला

मायावती चंद्रशेखर आजाद की इज्जत नहीं करतीं, जबकि वह उनका सम्मान करते हैं। बसपा के मनुवादी तत्व चंद्रशेखर को “चंदू” कहकर अपमानित करते हैं, जिससे ASP समर्थकों में आक्रोश बढ़ता है। यह मनुवादी नीति दलित एकता को तोड़ती है, और BJP की कुर्सी पक्की होती है। मायावती की चुप्पी उनकी मनुवादी शुभचिंतक मानसिकता को दर्शाती है। जब तक बसपा की नीति में सुधार नहीं होता, चंद्रशेखर आजाद ही दलित हितों का सच्चा प्रतिनिधि है।


### 4. आत्मकेंद्रित नेतृत्व: सगे भतीजे का दमन

मायावती इतनी आत्मकेंद्रित हैं कि उन्होंने अपने सगे भतीजे आकाश आनंद को भी, जब-जब उन्होंने BJP और मनुवादी ब्राह्मणों के खिलाफ बोला, पार्टी में दंडित किया। यह संदेश था कि कोई भी मनुवादी ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं बोलेगा। यह सिद्ध करता है कि मायावती दलितों के अधिकार, कल्याण और आर्थिक समानता की नहीं, बल्कि मनुवादी ब्राह्मणों की शुभचिंतक हैं।


### 5. सड़कों पर संघर्ष का अभाव: दलितों की अनदेखी

पिछले 15 सालों में मायावती ने दलितों के सम्मान या अत्याचारों के खिलाफ कोई सड़क पर संघर्ष नहीं किया। विपक्ष में रहकर भी वह ट्विटर बयानबाजी तक सीमित रहीं, मनुवादी ताकतों को खुश करती रहीं। चंद्रशेखर जैसे नेता विपक्ष में भी दलितों के लिए लड़ते हैं, पर मायावती का ऐसा कोई कदम नहीं दिखता। दलितों पर अत्याचार बढ़े, पर बसपा चुप रही, जो मनुवादी कब्जे का सबूत है। दलित उन्हें वोट क्यों दें, जब कोई गारंटी नहीं कि सत्ता में आने पर वे मनुवादी ब्राह्मणों को लाभ नहीं देंगी?


### 6. स्मारक और भ्रष्टाचार: मलाई मनुवादियों को

मायावती ने स्मारकों पर अरबों खर्च किए, पर दलितों के लिए शिक्षा, रोजगार या स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। NRHM और ताज कॉरिडोर जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों ने साबित किया कि सत्ता की मलाई मनुवादी ब्राह्मणों को मिली, जबकि दलितों को पत्थर की मूर्तियां। यह नीति दलित हितों की उपेक्षा का प्रतीक है।


### 7. जनता दरबार बंद: जिम्मेदारी से पलायन

मायावती ने जनता दरबार बंद कर दलितों की शिकायतों को अनसुना किया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सत्ता में रहते हुए भी उन्होंने मनुवादी ताकतों को मजबूत किया, जिससे दलितों का विश्वास टूटा। दलित उन्हें वोट क्यों दें, जब उनकी नीतियाँ केवल मनुवादी ब्राह्मणों के लिए हैं?


### 8. सत्ता में मनुवादी नीतियाँ: दलितों पर अत्याचार

सत्ता में रहते हुए मायावती ने सतीश मिश्रा को कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपकर दलितों पर अत्याचार को प्रत्यक्ष देखा। उनकी नीतियों ने मनुवादी ब्राह्मणों को सत्ता का सुख दिया, जबकि दलित उत्पीड़न का शिकार हुए। यह उनकी मनुवादी निष्ठा का सबूत है। दलित उन्हें वोट क्यों दें, जब उनकी सत्ता केवल मनुवादी ब्राह्मणों के लिए है?


### 9. ASP का उदय और विलय की संभावना

मायावती की मनुवादी नीतियों ने दलितों को ASP बनाने पर मजबूर किया। अगर मायावती ईमानदारी से पहल करें, तो ASP का बसपा में विलय हो सकता है, पर मनुवादी ब्राह्मण, जो उनकी विचारधारा पर कब्जा किए हुए हैं, ऐसा नहीं होने देंगे। जब तक बसपा की नीति में सुधार नहीं होता, चंद्रशेखर आजाद ही दलित हितों का सच्चा प्रतिनिधि है।


### दलित समाज के लिए हृदयविदारक पुकार

मायावती की मनuvadi नीतियों और सत्ता की लालसा ने बसपा को दलित हितों से विमुख कर दिया। मनuvadi ब्राह्मणों का कब्जा—सतीश मिश्रा से लेकर आकाश आनंद के दमन तक—सिद्ध करता है कि बसपा अब दलितों की नहीं, मनuvadi ब्राह्मणों की शुभचिंतक है। उनकी 15 साल की चुप्पी, सड़कों पर संघर्ष का अभाव, जनता दरबार बंद करना, और सत्ता में रहते हुए दलितों पर अत्याचार की अनदेखी उनकी मनuvadi निष्ठा को दर्शाती है। सत्ता में आने पर भी वे मनuvadi ब्राह्मणों के तलवे चाटेंगी, और दलितों के हाथ कुछ नहीं आएगा। ऐसी सत्ता दो कौड़ी की है। दलित समाज के चिंतक के रूप में, मैं मांग करता हूँ: मायावती बसपा को मनuvadi कीड़े से मुक्त करें। चंद्रशेखर का सम्मान करें, दलित एकता बनाएं, और 2027 में BJP की मनuvadi नीति को हराएं। मायावती की चाटुकारिता छोड़ें, कांशीराम जी की विरासत बचाएं, वरना बसपा से भागें! जब तक नीति में सुधार नहीं, चंद्रशेखर आजाद ही बेहतर हैं।


**जय भीम, जय भारत!**  

*यह हृदयविदारक पुकार दलित समाज की सच्चाई और बसपा को मनuvadi कब्जे से मुक्त करने की मांग है।*


सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा @9335122064

Saturday, August 9, 2025

व्यक्तिगत बात

 भ्राता जी,


मैंने इस तरह के मूर्खतापूर्ण वीडियो बनाने वालों की सच्चाई जानने के लिए अपने जीवन के 08 साल (2010-2018) लगा दिए। मैं 100 बातों का एक उत्तर देता हूँ।


उच्च जातियाँ बुद्धि, धन-दौलत और शक्ति में शूद्र जातियों से आगे हैं। वे इस तरह के पाखंड के प्रचार-प्रसार में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और इसे उत्सव के रूप में मनाते हैं। यह उनका मनोरंजन है।


शूद्रों ने उस विद्या को जाना ही नहीं, जिसके कारण उच्च जातियाँ उच्च हुई हैं। शूद्रों की सारी योग्यता खुद को उच्च दिखाने में होती है, इसलिए वे आपस में लड़ते रहते हैं और लगभग 6500 जातियों में बँट गए हैं। इन्हें बाँटने वाला कोई और नहीं, ये खुद आपस में लड़कर एक-दूसरे से अलग हुए हैं।


उच्च जातियों में आज भी संयुक्त परिवार प्रणाली पायी जाती है, जबकि शूद्र जातियों में संयुक्त परिवार प्रणाली न्यूनतम है।


उच्च जातियों ने अपने परिवार और समाज की एकता बनाए रखने के लिए ट्रस्ट बनाए और उन ट्रस्टों को अनुदान देते हैं। इन ट्रस्टों में कुछ बुद्धिजीवी शूद्रों का शोषण करने की विभिन्न आर्थिक नीतियाँ बनाते रहते हैं और सरकार के माध्यम से उन्हें लागू करते हैं।


शूद्र समाज अपनी मेहनत की सारी कमाई इन आर्थिक योजनाओं में लगाता है। इस कमाई को फिर हड़प लिया जाता है। केवल बड़े मामले प्रकाश में आते हैं, छोटे मामलों की कोई FIR नहीं होती। (नवनीत का फ्लैट आवंटन का मामला ले लो, इस प्रकार यह इकलौता मामला नहीं है, कोर्ट में ऐसे मामलों की भरमार है)


उदाहरण के लिए, सुब्रत सहाय का मामला, जो फुटकर दुकानों से ₹10-10 इकट्ठा करता था। हमारे समाज के लोग ही इसे इकट्ठा करके जमा करते थे। अंतिम परिणाम क्या हुआ, आपको पता होगा या मैं बताऊँ? सारा पैसा उसने उड़ा दिया। एक सुब्रत सहाय जेल गया, परंतु अपने पूरे खानदान को बना गया।


मूल विषय पर लौटते हैं। इस प्रकार के वीडियो उच्च जातियों द्वारा बनाए या बनवाए जाते हैं, ताकि शूद्र जातियाँ मानसिक रूप से कुंठित रहें और झूठे अहंकार से भर जाएँ कि वे सब जानते हैं, जिन्होंने इस प्रकार के थर्ड क्लास वीडियो देख लिए हैं। ऐसा वीडियो बौद्धों द्वारा बनाए जाते हैं, बौद्ध संघ में आज भी उच्च जातियों के भिक्षुओ का ही बोल वाला है 👏 इसलिए इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण वीडियो से दूर रहे 


 इस प्रकार के वीडियो देखकर शुद्र आपस में ही लड़ते रहते हैं—जिन्होंने वीडियो देख लिया और जिन्होंने नहीं देखा। यह बहुत उथले दर्जे की योग्यता है। बल्कि, इसे योग्यता भी नहीं कहना चाहिए, यह मात्र एक काल्पनिक जानकारी है।


मेरी ऐसी वीडियो देखने में कोई रुचि नहीं है, इसलिए मुझे इस तरह के वीडियो न भेजें। मैं अपना कोई वीडियो भी आपको नहीं भेजूँगा। मैं अपने वीडियो सोशल मीडिया ग्रुप में शेयर करता हूँ। आपकी इच्छा हो तो देख लें, न हो तो कोई बात नहीं।


मेरे पास 5-6 दर्जन ग्रुप हैं, जिन्हें मैं कभी-कभार ही देखता हूँ। मैं व्यक्तिगत मैसेज पर ध्यान देता हूँ और जो लोग व्यक्तिगत मैसेज में फालतू चीजें भेजते हैं, उसे भी नहीं देखता, अगर वह उनके स्वयं द्वारा निर्मित न हो।


आप चाहें तो अपने विचार मियांपुर ग्रुप में भेज सकते हैं, परंतु व्यक्तिगत मैसेज में सुचिता रखें, ताकि मैं आपके मैसेज को गंभीरता से ले सकूँ।


सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा @9335122064