Thursday, July 24, 2014

दलदल में दलित


एड. कमलेश कुमार मित्रा
मुख्य सचिव
धर्मचक्र कल्याण मित्र
ग्राम मियाॅपुर, पोस्ट कोडरा सरैयां
तह0 शाहाबाद, जिला हरदोई, उत्तर प्रदेश।
मो0-9335122064

दलदल में दलित


9 जुलाइ्र्र 2014 को हाई कोर्ट इलाहाबाद कोर्ट न0-09 में कुछ ऐसा घटित हुआ, जिसने सात साल बाद पुनः कलम (आंदोलन - भारतीय संविधान अनुच्छेद 51(क)-2 द्वारा संरक्षित) उठाने पर मजबूर कर दिया है। आज से दस साल पहले मैं मात्र एक इलेक्ट्रानिक डिप्लोमा होल्डर था और आई0ई0आर0टी0, इलाहाबाद के इलेक्ट्रªानिक विभाग की कम्प्यूटर लैब का इंचार्ज था। खुश था, इसलिए नही कि आरक्षण से नौकरी पा गया था, बल्कि इसलिए कि दलितो के दोहरे संघर्ष में एक से मुक्ति मिल गयी थी। दलित मात्र इसलिए दलित नही हैं कि उन्हें अन्य जातियों के साथ संघर्ष करना पड रहा है, दलित इसलिए भी दलित है क्योंकि उन्हे बाहरी संघर्ष के साथ भारी आन्तरिक संघर्ष से गुजरना पडता है। बाहरी संघर्ष की तरह, दलितो के आन्तरिक संघर्ष को भी हम कई उप खण्डों में विभक्त कर सकते हैं, इस विषय पर फिर कभी चर्च करेंगे। दलितो के इतिहास पर अबतक जो स्वतंत्र शोध कार्य मैंने किया है उसे दलित जातियाॅ स्वीकार करने में हिच्केंगी, और सुवर्णों के स्वीकार करने का तो सबाल ही पैदा नही होता, अन्यथा हम दलित होते ही नहीं परन्तु नामकरण संस्कार करने वाले पण्डे और समाजशास्त्र विषय के आचार्य इसे स्वीकार करेंगे कि दलित जातियों कि उत्पत्ति वर्ण व्यावस्था के अनुसार प्रतिलोम संबधो से हुई है, तथा दलित कभी शूद्र नहीं रहे क्योंकि शूद्र कभी अस्पृश्य नहीं थे। आज भी यह विभाजन अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ी जाति के रूप में दिखायी देता है। उच्च वर्ण की स्त्रियों के गर्भ से उत्पन्न निम्न वर्ण के पुरूषों की संताने ही समाज में अस्पृश्य रखी गयी तथा उनसे निकृष्टतम् कर्म कराये गये ताकि उच्च वर्ण की स्त्रियां, निम्न वर्ण के पुरूषांे की ओर आकर्षित न हों। फिर भी बहुत से संबध स्वेच्छा और बलपूर्वक स्थापित हुए जिस कारण दलित जातियों का जन्म हुआ। कालांतर में यह जातियां अपनी बंश-बेल बढाती गयी और अपनी जाति की उत्पत्ति का मूल कारण भूल गयी और निकृष्ट कर्म के आधार को अपनी जाति की उत्पत्ति का कारण मानने लगी।

     डा0 भीमराव अम्बेडकर इतिहास का एक ऐसा नाम जो युगों-युगों तक याद किया जायेगा। इसलिए नही कि मात्र उन्होने दलितो को आरक्षण दिलाया या भारत का संविधान लिखा बल्कि हजारों वर्ष पहले अयोध्या के राजा रामचन्द्र  ने कर्म प्रधान जाति व्यावस्था को बदल कर जन्म आधारित कर्म व्यावस्था का स्श्रजन कर तिकड़मी युग की स्थापना की, तथा श्रमिको और स्त्रियों के लिए अपमान भरी जो व्यावस्था बनायी थी, उसका अन्त डा0 भीमराव अम्बेडकर ने कर दिया। राजा राममोहन राय ने ईस्टइंडि़या कंपनी की मदद से सती प्रथा पर रोक तो लगवा दी परन्तु उन विधवा स्त्रियों के सम्मान जनक जीवन जीने के लिए कुछ न कर सके। डा0 अम्बेडकर ने ऐसी स्त्री को गले लगाकर तथा कानूनी अधिकार दिलवा कर जो सम्मान दिया तथा भविष्य की उन्नति के जो मार्ग प्रशस्त किये हैं क्या सुवर्ण स्त्रियां उसे भूल गयी है? क्या वे यह भी भूल गयी हैं कि दलित जातियां कोई और नहीं उनकी ही परदादी, परनानी के गर्भ से उत्पन्न संताने हैं जो उनके ही परदादा, परनाना द्वारा अस्पृश्यता के दलदल में भेजी गयी हैं। इतिहास पर नजर डालता हॅू तो कई विदूषी स्त्रियों के उदाहरण मिलते हैं परन्तु न्यायाधीश स्त्रियों के नही। डा0 भीमराव अम्बेडकर ने उन्हे यह सम्मान दिया और आज वह समय आया है कि सुवर्ण स्त्रियां दलित जातियों के साथ न्याय करें।

        डा0 अम्बेडकर को जिन्होने (शिक्षक) पढने नहीं दिया, डा0 अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में ऐसे लोगो को कोई सम्मान नहीं दिया परन्तु न्यायाधीश को भारत के राष्ट्रपति के समान सुरक्षित कर दिया, जो राष्ट्रपति का भी सलाहकार होता है। वह सुवर्ण न्यायाधीश स्त्री होकर आरक्षण की उपेक्षा करे और कहे कि तुम्हारे केश में कुछ स्पेशल नही है, तथा कोई दलील सुनना ही न चांहे तो मेरे जैसे व्यक्ति की तकलीफ असहनीय हो जाती है, यह बात ठीक बैसी ही है जब कोई स्त्री अपनी संतान को हरामी कहे। परमात्मा का कुछ ऐसा संयोग है कि मैं अक्सर हाई कोर्ट इलाहाबाद, हाई कोर्ट दिल्ली, हाई कोर्ट नैनीताल, देहरादून कोर्ट, हरिद्वार कोर्ट, शाजहाॅपुर कोर्ट, हरदोई कोर्ट, दिल्ली कोर्ट जाता आता रहता हूॅ। कुछ ऐसे जज हैं जिनसे सभी अपनी बात कहना चाहते हैं और उनकी सुनवायी लिस्ट कभी 25-30 से ऊपर नही पहुॅच पाती। जबकि कुछ ऐसे भी जज हैं जो 50-55 या अधिक की लिस्ट भी रिवाईज कर लेते हैं, जिन्हे बात करने की तमीज नही है, वादी और प्रतिवादी दोनो ही ऐसे जज की कोर्ट में बहस करने से बचते रहते हैं और अगली तारीख ले लेते हैं, इस प्रकार न्यायपालिका पर मुकदमों का भार बढता चला गया है।

     ’’जो स्वयं स्नान नहीं करता उसे पकड कर लोग जबर दस्ती नहला देते हैं।’’ संसद ऐसे जजों के लिए कोई कानून बनाये या संविधान प्रदत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो की सुरक्षा शक्ति को कमजोर करे, उससे पहले उच्चतम् न्यायालय से अनुरोध है कि वह ऐसे जजो को समय पूर्व सेवानिवृत्ति प्रदान करने का नियम बनाये जिनकी कोर्ट में अधिवक्ता वहस करना नही चाहते। वादी या प्रतिवादी किसी न्यायाधीश के निर्णय को तभी सम्मान दे सकते हैं जब न्यायाधीश निष्पक्षता पूर्ण करूणा (अहंकार नही) का प्रदर्शन करते हुए न्याय करे। उच्चतम् न्यायालय में न्यायाधीशो की संख्या जितनी कम होगी न्यायायिक एकरूकता बनी रहेगी। उच्चतम् न्यायालय में न्यायाधीशो की संख्या कम की जानी चाहिए तथा उच्च न्यायालय में न्यायाधीशो की संख्या बढायी जानी चाहिए। अवर न्यायालय मात्र यांत्रिक मशीन ही न हो उन्हे विवेकाधिकार दिया जाना चहिए तथा वह संविधान की मूल भावना के साथ सिंक्रोनाईज हों उच्च न्यायालय इस बात की जाॅच कर आगाह/नियंत्रित करता रहे। क्योंकि हर मुकदमा अद्वतीय होता है, वह उसी रूप में, जैसा वह है तभी लिखा जा सकेगा जब उस पर निर्णय करने का विवेकाधिकार न्यायाधीश के पास हो। अवर न्यायालय में मैं देखता हॅू कोई भी मुकदमा 20 प्रतिशत भी वैसा नही लिखा जाता जैसा वह होता है। 80 प्रतिशत झूठ लिखे जाने वाले मुकदमे के लिए जिम्मेदार है उच्च न्यायालय और उच्चतम् न्यायालय की रूलिंग और प्रक्रिया संहिता जो अपराधियो की आरामगाह और निर्रापराधियों की सजा है। इस प्रकार उच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशो को भ्रम हो जाता है कि मुकदमें में कुछ स्पेशल नही है, इसलिए वह न तो कोई दलील सुनना चाहते हैं न ही उसी केस में हुए पुराने आदेश को देखते हैं। यह अहंकार का मामला है अथवा जातिगत दुर्भावना का! ऐसा ही कुछ हुआ है अग्राकिंत मुकदमें में .............कोर्ट न0 - 09, दिनांक 9.7.2014 को ! सन 2002 का यह मुकदमा सन 2008 से उच्च न्यायालय इलाहाबाद में लंबित है। 12 साल हो गया, दलित इस दलदल से कब निकलेगा? और कब नौकरी करेगा?  

Court No. - 9
Case :- WRIT - A No. - 56821 of 2008
Petitioner :- Kamlesh Kumar Mitra
Respondent :- Technical Educatin Counsil U.P. Govt. Lko & Others
Counsel for Petitioner :- R.L. Verma,B. Ram
Counsel for Respondent :- C.S.C.,Aditya Kr. Singh
Hon'ble Bharati Sapru,J.
List in the next cause list showing the name of Shri A.N. Singh as learned counsel for the respondents.
Order Date :- 9.7.2014
( जबकि श्री ए0एन0 सिंह का नाम 9 जुलाई 2014 की लिस्ठ में प्रिंट था। इसके लिए 28 अप्रैल 2014 को Hon'ble Vivek Kumar Birla,J.आदेश किया गया था )
Court No. - 7
Case :- WRIT - A No. - 56821 of 2008
Petitioner :- Kamlesh Kumar Mitra
Respondent :- Technical Educatin Counsil U.P. Govt. Lko & Others
Counsel for Petitioner :- R.L. Verma,B. Ram
Counsel for Respondent :- C.S.C.,Aditya Kr. Singh
Hon'ble Abhinava Upadhya,J.
As prayed, list on 9th July, 2014.
Order Date :- 21.5.2014
SKM
Court No. - 29
Case :- WRIT - A No. - 56821 of 2008
Petitioner :- Kamlesh Kumar Mitra
Respondent :- Technical Educatin Counsil U.P. Govt. Lko & Others
Counsel for Petitioner :- R.L. Verma,B. Ram
Counsel for Respondent :- C.S.C.,Aditya Kr. Singh
Hon'ble Vivek Kumar Birla,J.
Sri Aditya Kumar Singh learned counsel for the respondent states that now he is no longer counsel for the Technical Education. He states that now Sri Amrendra Nath Singh is appearing as counsel for Technical Education Council.
In the interest of justice list in the next cause list showing the name of Sri Amrendra Nath Singh as counsel for the respondent.
Sri Kamlesh Kumar Mitra appeared in person.
In the meantime, Sri Kamlesh Kumar Mitra shall take no objection from the counsel, who are appearing on his behalf in this case withdrawing their power.
List again in the next cause list.
Order Date :- 28.4.2014

Court No. - 37
Case :- WRIT - A No. - 56821 of 2008
Petitioner :- Kamlesh Kumar Mitra
Respondent :- Technical Educatin Counsil U.P. Govt. Lko & Others
Petitioner Counsel :- R.L. Verma,B. Ram
Respondent Counsel :- C.S.C.,Aditya Kr. Singh
Hon'ble Shashi Kant Gupta,J.
Passed over on the request of learned counsel for the respondent.
Order Date :- 11.9.2009
IA


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