Saturday, June 20, 2026

 आधुनिक भारत में कामुकता की बाढ़, बेरोजगारी और परिवार व्यवस्था का विखंडन: समस्या, कारण और समाधान 


— सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा


20 जून को जंतर मंतर पर कॉकरोच आंदोलन का पुनः प्रदर्शन हुआ। यह आंदोलन बेरोजगारी के विकराल रूप को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इसमें लड़के और लड़कियां दोनों बड़ी संख्या में शामिल हुए, परंतु परिवार के बड़े-बूढ़े या अन्य सदस्य दिखाई नहीं दिए। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यदि परिवार के लोग भी इस आंदोलन में शामिल होते, तो युवा पीढ़ी केवल नौकरी की मांग नहीं, बल्कि परिवार स्थापित करने, बच्चों के भविष्य और सामाजिक न्याय की भी बात करती। दुर्भाग्य से आज युवा परिवार निर्माण की सोच ही खोते जा रहे हैं।


यह घटना हमारे समाज की गहरी बीमारी को उजागर करती है।


समस्या (रोग) की गंभीरता


व्हाट्सएप के “Locked Chats” में रात के 1 से 3 बजे तक युवाओं की भीड़ दिखती है। ग्रुप नाम जैसे “कपल टू कपल लुधियाना”, “Mam Ho to aisi 🤰”, “HOT MOM”, “Desi aunty ke chut”, “Madarsha me full chodai”, “Hot boys and uncles”, “School boy”, “पाली जोधपुर ग्रुप टॉपबटन” आदि खुलेआम अश्लीलता, स्विंगिंग, pregnancy fetish और चुदाई वाली सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं। 


Blurred वीडियो, वीडियो कॉल, नंगी फोटोज और लोकेशन शेयरिंग आम हैं। यह रोग युवाओं को virtual sex addiction में डुबो रहा है, जिससे real relationships, शादी, परिवार संभालने की क्षमता और जिम्मेदारी खत्म हो रही है।


समस्या उत्पन्न होने के कर्म (कारण)


काम इच्छा मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्ति है, जो मौसम, भोजन, शारीरिक स्थिति और आंतरिक विकारों पर निर्भर करती है। गर्मी में बढ़ती है, तनाव-बेरोजगारी में उग्र हो जाती है।


संयुक्त परिवार व्यवस्था में इस काम इच्छा का समाधान आंतरिक रूप से होता था। घर की थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-दूध सब उपलब्ध रहता था। किसी को केवल सब्जी या केवल दूध की इच्छा हो तो वह अपनी जरूरत ले लेता था। 


ठीक उसी प्रकार शरीर की भूख भी संयुक्त परिवार में मांग और पूर्ति के आधार पर संतुलित रहती थी। यह भूख केवल चुदाई तक सीमित नहीं थी। इसमें भावनात्मक संतुलन सबसे महत्वपूर्ण था — आलिंगन, मालिश, सहज स्पर्श, बातचीत, हंसी-मजाक, देखभाल और निकटता। 


संयुक्त परिवार में सब एक छत के नीचे रहते थे, भावनात्मक भूख स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थी। जब संयुक्त परिवार टूटे, nuclear परिवार बढ़े, तब यह संतुलन बिखर गया। बेरोजगारी, loneliness, सम्मान की भूख और सुख की चाहत ने युवाओं को WhatsApp के अश्लील ग्रुप्स में धकेल दिया।


20 जून का जंतर मंतर आंदोलन इसी विकराल स्थिति का प्रतीक है — युवा सड़क पर हैं, लेकिन परिवार के साथ नहीं। वे परिवार स्थापित करने के बजाय व्यक्तिगत frustration में फंसे हैं।


समाधान से पहले महत्वपूर्ण बात


कुछ लोग तुरंत कानून का डंडा उठाने की बात करते हैं। लेकिन यह नागरिक स्वतंत्रता का हनन होगा। मानव को जिंदा रहने के लिए पेट की भूख, काम की भूख, सम्मान की भूख और सुख से रहने की चाहत — इन सबका सम्मान जरूरी है। दमन से समस्या हल नहीं होगी।


 समस्या के समाधान


1. संयुक्त परिवार व्यवस्था को पुनर्जीवित करना — महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा बताई गई नियोग और दत्तक ग्रहण जैसी व्यवस्थाओं को समझदारी से अपनाकर परिवार को भावनात्मक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाएं।


2. रोजगार सृजन और आर्थिक सुरक्षा— सरकार को युवाओं के लिए सार्थक अवसर पैदा करने चाहिए, ताकि वे परिवार स्थापित करने की सोच सकें।


3. शिक्षा और जागरूकता— काम इच्छा को न दबाएं, न अनियंत्रित होने दें। ओशो की जागरूकता को समझें लेकिन open sex की निंदा करें। नैतिक शिक्षा और आत्म-नियंत्रण सिखाएं।


4. भावनात्मक समर्थन — योग, खेल, परिवार के अंदर स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को बढ़ावा दें।


5. डिजिटल साक्षरता— virtual सुख की क्षणभंगुरता समझाएं।


निष्कर्ष:  

20 जून का कॉकरोच आंदोलन हमें चेतावनी दे रहा है। यदि युवा परिवार के साथ नहीं जुड़ेंगे, तो समाज की नींव ही डगमगा जाएगी। हमें संयुक्त परिवार, रोजगार और नैतिक मूल्यों को मजबूत करके ही इस रोग का समाधान करना होगा। न अंधी छूट, न अंधा दमन — संतुलित, परिवार-केंद्रित समाज ही मजबूत राष्ट्र की गारंटी है।


जय भारत।

कमलेश कुमार मित्रा

(सामाजिक चिंतक एवं अधिवक्ता)



 


 परिवार व्यवस्था: प्राचीन भारतीय दृष्टि और आधुनिक चुनौतियाँ


— सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा


आज के युग में जब पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता के नाम पर भारतीय परिवार व्यवस्था तेजी से विखंडित हो रही है, तब हमें प्राचीन भारतीय ज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा की ओर लौटने की अत्यंत आवश्यकता है। “बुद्ध और ओशो : मानवीय संबंध बनाम सामाजिक संबंध” जैसे मंच इस दिशा में सकारात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करते हैं।


महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों पर आधारित परिवार व्यवस्था को समाज की मजबूत नींव माना। उन्होंने संयुक्त परिवार को सर्वोत्तम बताया, जहां वंश की निरंतरता के लिए नियोग प्रथा और दत्तक ग्रहण (adoption) को भी वैध स्थान दिया गया। यह व्यवस्था अनैतिकता नहीं, बल्कि परिवार की भावनात्मक, सामाजिक और जैविक निरंतरता सुनिश्चित करने का वैज्ञानिक तथा धार्मिक माध्यम थी।


ओशो की धारणा हमें आंतरिक जागरूकता और सजगता की ओर ले जाती है। वे संबंधों में कृत्रिम सामाजिक बंधनों की बजाय सच्ची मानवीय समझ और प्रेम पर बल देते हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता कभी भी अनियंत्रित कामुकता या परिवार-विरोधी आचरण की छूट नहीं देती। ओशो का संदेश है — दमन और अंधी परंपरा दोनों से बचते हुए, सजग और जिम्मेदार जीवन जियो।


दुर्भाग्य से, ईसाई धर्म द्वारा प्रचारित incest taboo की अति-कठोर और विकृत व्याख्या ने विश्व भर में संयुक्त परिवार व्यवस्था को तोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस taboo ने रिश्तेदारों के बीच स्वाभाविक निकटता और विश्वास को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार विखंडित हुए, nuclear families का बोलबाला हुआ और अंततः ओपन सेक्स जैसी अनियंत्रित, अनैतिक और परिवार-विनाशक संस्कृति को बढ़ावा मिला। 


पाश्चात्य समाज में extreme openness ने परिवारों को जड़ से कमजोर कर दिया है, जबकि blind suppression भी हानिकारक है। इसलिए हमें मध्य मार्ग अपनाना चाहिए — दयानंद सरस्वती की वेद-आधारित संयुक्त परिवार व्यवस्था, नियोग एवं दत्तक प्रथा को पुनर्जीवित करते हुए, ओशो की जागरूकता को अपनाते हुए। 


ओपन सेक्स को हम पूर्ण रूप से निंदनीय मानते हैं। यह न तो प्रेम है, न जिम्मेदारी, और न ही समाज या राष्ट्र के लिए हितकारी। यह केवल व्यक्तिगत भोग और परिवार के विखंडन का कारण बनता है। 


युवा पीढ़ी को जागरूक करना हमारा राष्ट्रधर्म है। आइए, हम पारिवारिक बंधनों को फिर से मजबूत करें — प्राचीन भारतीय मूल्यों को आधुनिक समझ के साथ जोड़ें, न पाश्चात्य अंधानुकरण में फंसें, न ही पुरानी रूढ़ियों में जकड़ें। सच्चा मानवीय संबंध वही है जो संयुक्त परिवार को मजबूत बनाए, संतान सुख दे और समाज को सुदृढ़ करे।


जय भारत। 


— कमलेश कुमार मित्रा 

(सामाजिक चिंतक एवं अधिवक्ता)



महर्षि दयानंद सरस्वती ने परिवार नामक संस्था को प्रमोट किया है🙏

 टाइटल: परिवार संस्था, नियोग और कुलीनता: भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं पुनरुत्थान 🙏


महर्षि दयानंद सरस्वती ने परिवार नामक संस्था को प्रमोट किया है🙏  

नियोग और नियोग सहित दत्तक ग्रहण को स्वीकार किया है 🙏  


नियोग और नियोग सहित दत्तक ग्रहण को समझ समझ लिया जाए🙏  


1. नियोग तब होता है जब पुरुष नपुंसक हो, अथवा अनुपस्थित हो और उसकी पत्नी स्वस्थ हो, और परिवार को बच्चों की आवश्यकता हो तो परिवार की इच्छा से स्त्री, अथवा परिवार की जानकारी में स्त्री परिवार के अंदर अथवा संयुक्त परिवार के अंदर किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाकर बच्चा प्राप्त कर सकती है🙏 इसके कारण परिवार और संयुक्त परिवार मजबूत होता है, किस तरह के रिश्तों को स्वीकार करने से, सामान्य अवस्था में प्रेम प्रसंग पर भी कोई आपत्ति नहीं होती है परिवार मजबूत होता है🙏 धृतराष्ट्र और पांडु की उत्पत्ति नियोग से हुई, वेदव्यास परिवार का ही सदस्य था, इसके विपरीत परिवार के बाहर के व्यक्ति से युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव की उत्पत्ति हुई थी🙏  


2. नियोग सहित दत्तक ग्रहण :- जब पत्नी बाँझ हो, तो पुरुष अपनी इच्छित स्त्री के साथ, उसकी सहमति अथवा उसके पुरुष साथी(पति)की सहमति से शारीरिक संबंध बनाकर बच्चा प्राप्त कर सकता है, और फिर उसे गोद ले सकता है इससे भी पारिवारिक संबंध मजबूत होता है, सामान्य अवस्था में प्रेम प्रसंग पर कोई आपत्ति नहीं होती है, पांचाली का उदाहरण एक ही स्त्री से पांचो भाइयों ने बच्चे पैदा किया🙏  


महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसी का विस्तार किया है स्वीकार किया है सत्यार्थ प्रकाश में, महर्षि दयानंद सरस्वती ने बाहरी संबंधों को वर्जित किया है, परंतु परिवार के अंदर के संबंधों को स्वीकार किया है, क्योंकि यह परिवार और संयुक्त परिवार के प्रेम को बढ़ाने वाला है 🙏  


आचार्य रजनीश ने पुराने मॉडल को ही स्वीकार किया है, उन्होंने नियोग के लिए बाहरी और आंतरिक दोनों ही संबंधों को स्वीकार किया है, प्रेम को प्रमुखता दी है 🙏  


साम्राज्य विस्तार के अंतर्गत, 15वीं शताब्दी में चर्च के पादरियों ने नया नियम बनाया, और घर की स्त्रियों के साथ संबंध बनाने को वर्जित कर दिया, और बाहरी स्त्रियों के साथ संबंध बनाना सामान्य कर दिया, इसके कारण क्रिश्चियन सैनिकों को सुविधा हो गई, उनमें धार्मिक रूप से अपराध बोध नहीं होता था, परंतु इस कारण से अंग्रेजों की 70 कॉलोनी में वहां ही संस्कृति पूरी तरह से नष्ट हो गई, उनके साहित्य को भी अलट-पलट दिया गया 🙏  


भारत में कुलीन प्रथा रही है, कुलीन प्रथा का मतलब होता है कुल के अंदर के संबंध, मुस्लिम समाज में भी कुलीन प्रथा रही है, अर्थात कुल के अंदर के संबंध, मुसलमान निर्वाध रूप से भारत पर शासन करते रहे सामाजिक रूप से कभी किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई, परंतु अंग्रेजों द्वारा थोपी गई क्रिश्चियन व्यवस्था के कारण यहां का सामाजिक ढांचा तहस-नहस हो गया और अंग्रेजों का विरोध होने लगा, मुसलमानों ने जिन भारतीय स्त्रियों से शारीरिक संबंध बनाएं उन्हें पत्नी का दर्जा दिया परंतु अंग्रेजों ने जिन स्त्रियों के साथ शारीरिक संबंध बनाए उन्हें पत्नी का दर्जा नहीं दिया🙏  

बल्कि रेड लाइट एरिया बनाएं, जिसको समाज में गन्दा की दृष्टि से देखा जाता था, इसके विपरीत गणिका, और तवायफ तहजीब के लिए जानी जाती थी🙏  


सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा उपरोक्त सभी का गहन अध्ययन के पश्चात उपरोक्त दृष्टिकोण को रखते हैं🙏  


हमारी अगली पीढ़ी हमारे युवा, उनका शारीरिक और मानसिक सुख शांति के लिए, महर्षि दयानंद सरस्वती, और आचार्य रजनीश के ही मॉडल को स्वीकार करना पड़ेगा🙏  


15वीं शताब्दी में रोमन चर्च के पादरी द्वारा जो नियम (incest taboo) बनाया गया है, इसका पुरजोर विरोध करना पड़ेगा तभी हमारे परिवारों और संयुक्त परिवारों में प्रेम बढ़ेगा🙏  


नातेदारी के संबंध ससुराल के संबंध होते हैं, कई बार इस संबंध भी कुलीनता में आते हैं 🙏 परंतु कुल के बाहर के संबंध, कुलहीनता कहलाती है, मुसलमानों ने कुलीनता और कुलहीनता दोनों का समान रूप से पालन किया, परंतु अंग्रेजों ने केवल कुलहीनता को ही बढ़ावा दिया, और ब्राह्मणों के माध्यम से हमारे पारिवारिक संरचना के ग्रंथो को भी उलट पलट कर दिया 🙏  


भारतीय परिवेश में केवल सपिंड वर्जित था, जैसा ऋग्वेद के दशम अध्याय यम-यमी के प्रकरण में मिलता है, पिता के साथ संबंध को नैतिक रूप से प्रतिबंधित किया गया, इस सिद्धांत के आधार पर की फल अपना वृक्ष नहीं खाता नदी अपना पानी नहीं पीती, परंतु इस प्रेम में वात्सल्य और कर्तव्य वर्जित नहीं था, इसलिए ब्रह्मा के अस्तित्व को बनाए रखा गया, उनको साहित्य से नकारा नहीं गया है 🙏  


बच्चा प्राप्त करने के लिए, एवं स्थाई रूप से शारीरिक संबंध, और भावात्मक संबंध को बनाए रखने के लिए, माता की तरफ तीन पीढ़ी तक और पिता की तरफ सात पीढ़ी तक कुल माना जाता था और विवाह संबंध भी इनके अंदर ही किए जाते थे, इसलिए भारत की जाति व्यवस्था काफी मजबूत है, जाति व्यवस्था की मजबूती का कारण यही है, यह दूसरी बात है कि इस जाति व्यवस्था के कारण, परस्पर जातियां एक दूसरे का शोषण करने लगी 🙏  


इसलिए आर्थिक समानता का मूवमेंट चलाया जाना आवश्यक है, कुलीनता को बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि परिवार संयुक्त परिवार में प्रेम बढ़े, अप्राकृतिक शारीरिक संबंध, लेस्बियन और गे की आवश्यकता ना पड़े!


ट्रांसजेंडर संबंध, प्राकृतिक रूप से प्रकृति के मारे हुए हैं, उनके प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए, अर्जुन का ट्रांसजेंडर होना इसी बात की ओर इशारा करता है🙏  


भारतीय संस्कृति में महाभारत और रामायण ग्रंथ का महत्व इसीलिए है, यह भारत की संस्कृति को दर्शाते हैं, और सामाजिक विवाद को भी, उसके परिणाम को भी 🙏  


जागो युवाओं जागो, डेटिंग के लिए OYO के होटल का प्रयोग करना बंद करो, यह दारू के ठेके की तरह, तुम्हारे मोहल्ले की गली में खुलने लगे हैं, तुम्हारी संस्कृति पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी, यदि तुम किसी लड़की के साथ, डेटिंग पर हो, तो वह किसी की बहन होगी, यह तुम्हारी बहन के ऊपर भी लागू होता है, इसे पारिवारिक प्रेम नहीं बढ़ता, संयुक्त परिवार का प्रेम नहीं बढ़ता है, अनावश्यक रूप से आर्थिक प्रतियोगिता बढ़ती है, होटल वालों के मजे बढ़ाते हैं, तुम्हारी सामाजिक, शारीरिक और मानसिक हानि होती है, परिवार और संयुक्त परिवार का संबंध पूरी तरह से नष्ट हो जाता है, कुलीनता समाप्त हो जाती है 🙏  


आप सभी युवा हो चीजों को समझते हो, जो ना समझ में आए मुझसे पूछ सकते हो, लेकिन केवल चैटिंग में🙏  


सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा 🙏



समाज व्यवस्था की शब्दावली

 टाइटल: भारतीय समाज एवं परिवार व्यवस्था से संबंधित मूलभूत शब्दावली और सामाजिक संरचना 🙏


आज कुछ basic terms को समझ लेते हैं जो परिवार व्यवस्था से संबंधित हैं 🙏


1. व्यक्तिवाद, इंडिविजुअलिज्म :- भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि भारत में व्यक्ति बचपन से लेकर अपनी मृत्यु अवस्था तक किसी न किसी के साथ रहता है, बचपन में मां-बाप के साथ, जवानी में भाई-बहन या पत्नी के साथ, प्रौढ़ अवस्था में अपनी जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों के साथ, बुढ़ापे में अपने बच्चों और उनके बच्चों के साथ।  

 

व्यक्तिवाद का मॉडल पूरी तरह से पश्चिमी व्यक्तिवादी है, यह मॉडल मानकर चलता है कि पैसा है तो सब कुछ खरीदा जा सकता है इसलिए व्यक्तिगत रूप से आदमी पैसे की होड़ में लगा रहता है, और कैसे भी पैसा एकत्र करके दूसरों का शोषण करना चाहता है🙏  


इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि व्यक्तिवाद का जहर भारत में भी फैल रहा है, परंतु फिर भी यह परिवार और संयुक्त परिवार के साथ रहते हुए अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने की कोशिश करता है जिसमें परिवार के अंदर सुप्रीमेसी स्थापित होती है, और परिवार का विखंडन बढ़ता है। इस व्यक्तिवाद को संबंधित कानून को समाप्त करना पड़ेगा। धन और काम (sex) भारतीय परिवारों की संयुक्त व्यवस्था का अंग रहा है। धन और काम का उपयोग परिवार के व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार करुणा पूर्ण ढंग से प्रदान किया जाता था, ताकि वह अपने जीवन को अच्छा बना सके और इस परंपरा को आगे बढ़ा सके। इसीलिए विवाह एक संस्कार और उत्सव के रूप में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। पश्चिमी जगत की तरह केवल चर्च के पादरी से होने से विवाह संपन्न नहीं होता, भारतीय संस्कारों में परिवार का होना विवाह के समय आवश्यक होता है, क्योंकि विवाह एक उत्सव होता है🙏  


अंतिम रूप से कह सकते हैं, व्यक्तिवाद का भारतीय व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है यह एक बीमारी के रूप में कुछ महत्वाकांक्षी लोगों की मानसिकता में घर कर रहा है🙏


2. परिवार: पति-पत्नी और उनके बच्चे, परंतु इसका अस्तित्व संयुक्त परिवार के बिना नहीं है, परिवार संयुक्त परिवार का अंग होता है, और कई बार धन और काम के लिए एक मजबूत पारिवारिक व्यवस्था बनता है जो उत्सव और त्योहारों के अवसर धन और काम का सम्मिश्रण होता है, बच्चे अपनी बाल अवस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, और प्रौढ़ावस्था के अनुसार आनंद लेते हैं, संयुक्त परिवार एक शिक्षण संस्थान के रूप में आंतरिक व्यक्तियों को परंपरा से प्रशिक्षित करता रहता है/करता रहा है🙏


3. संयुक्त परिवार :- तीन पीढ़ियां तक वैवाहिक जीवन के साथ, परिवार के बच्चों के साथ, अर्थात पिता की तरफ दादा-दादी से शुरू होकर, ताऊ, चाचा, ताई, चाची, चचेरे भाई-बहन, कुंवारी बहनें, बुआ आदि तक, कई बार विवाहित बहन और विवाहित बुआ लोग भी परिवार के साथ रहने लगते हैं, उनको संयुक्त परिवार का अंग ही माना जाता है, परंतु उसे नातेदारी के अंतर्गत भी लिया जाता है🙏


4. नातेदारी :- जब परिवार की स्त्रियां विवाह करके दूसरे परिवार से जुड़ जाती हैं, और वहां पर पृथक रूप से बच्चे उत्पन्न करती हैं तो वह सभी नातेदार कहलाते हैं, परंतु ऐसी नातेदारी, जो माता की ओर तीन पीढ़ी तक, और पिता की ओर सात पीढ़ी तक रही हो, उसके अंदर ही विवाह संबंध किए गए हो, तो इसे कुल कहा जाता है 🙏


5. कुल/कुलीनता :- पिता की ओर सात पीढ़ी तक और माता की ओर तीन पीढ़ी तक कुल माना जाता है, कई बार इस संबंध नातेदारी से आ जाते हैं, लंबे समय में यह कुल का अंग ही माने जाने लगते हैं, यहीं से जाति का उदय हो जाता है🙏


6. जाति :- जाति एक ओर जैविक संबंध की तरफ इशारा करती है दूसरी तरफ आर्थिक संसाधनों को प्राप्त करने के काम से भी जोड़ती है, अर्थात धन/अर्थ और काम की समानता आधार पर जातियां जड़ रूप में स्थापित हुई हैं, समान कार्य करने वाली के साथ विवाह के रूप में शारीरिक संबंध स्थापित करना, अर्थात कई कुलों का आपस में जुड़ना जाति व्यवस्था को परिष्कृत करता है, विस्तारित करता है🙏


7. समाज :- जातियों के आंतरिक संबंध जो अर्थ और काम पर आधारित हैं जब अन्य जातियों के साथ आदान-प्रदान करते हैं, जिसे व्यापारिक संबंध कह सकते हैं, मुख्यतः अर्थ पर निर्भर होते हैं, आदान-प्रदान होता है। श्रम के क्रय-विक्रय पर आधारित होता है, श्रम का क्रय-विक्रय : मांग-पूर्ति की मजबूरी और शासन की लापरवाही अथवा झुकाव के कारण कुछ जातियों के पक्ष में, उनके श्रम को अधिक मूल्य देता है, दूसरे के श्रम को कम मूल्य देता है आर्थिक असंतुलन पैदा करता है🙏


8. सामाजिक अंतर्विरोध :- जब दो जातियों में आर्थिक असंतुलन को लेकर संघर्ष आरंभ होता है, किसी के श्रम को अधिक मूल्य और किसी के श्रम को कम मूल्य दिया जाता है, विद्रोह का कारण बनता है, विद्रोह बाहरी शक्तियों का आमंत्रण करता है, ताकि वह संतुलन की अवस्था में आ सके 🙏


9. विद्रोह और संघर्ष:- विद्रोह जब संघर्ष का रूप ले लेता है, तो जिस अन्य समाज से उसको सहयोग प्राप्त होता है उसके प्रति ऋणी हो जाता है, यदि उसे समाज का जिससे विद्रोही ने सहायता प्राप्त की है, एक कुशल नेतृत्व है तो वह राज्य के रूप में स्थापित होता है, और यदि यह विद्रोही सफलता प्राप्त करता है, तो एक राज्य के रूप में स्थापित हो जाता है, और इस प्रकार समाज में दो अलग-अलग राज्य स्थापित हो जाते हैं🙏


10. राज्यों के अंदर पुनः महत्वाकांक्षी और व्यक्तिवादी सोच के लोग पैदा होने लगते हैं, वह अधिक से अधिक धन अर्जित कर लेना चाहते हैं, इस तरह से पूंजीवाद का उदय राज्य के अंदर होने लगता है, और यह पूंजीवादी लोग राज्य को प्रभावित करने लगते हैं क्योंकि यह स्वयं राज्य से उत्पन्न होते हैं, पीढ़ियों के अंतराल बाद पूंजीवाद स्थाई रूप ले लेता है, राज्य उनके अनुसार कार्य नहीं करता तो यह पूंजीवादी लोग जनता का शोषण बढ़ा देते हैं, और राज्य में विद्रोह शुरू हो जाता है, राज्य की स्थिरता अथवा स्थिरता की चाबी इन पूंजीवादी लोगों के पास आ जाती है इसलिए राजनीति में अस्थिर लोग पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद का आंदोलन चलाते हैं परंतु उनके अंतर चित्त में कहीं ना कहीं व्यक्तिवाद बना रहता है, और नेता के रूप में स्थापित होकर अपनी ही जय कराते रहते हैं🙏


11. समाजवाद और पूंजीवाद का संघर्ष: आजकल पूरे विश्व में देखा जा रहा है इस पर अलग से चर्चा करेंगे🙏


सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा 🙏