आधुनिक भारत में कामुकता की बाढ़, बेरोजगारी और परिवार व्यवस्था का विखंडन: समस्या, कारण और समाधान
— सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा
20 जून को जंतर मंतर पर कॉकरोच आंदोलन का पुनः प्रदर्शन हुआ। यह आंदोलन बेरोजगारी के विकराल रूप को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इसमें लड़के और लड़कियां दोनों बड़ी संख्या में शामिल हुए, परंतु परिवार के बड़े-बूढ़े या अन्य सदस्य दिखाई नहीं दिए। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यदि परिवार के लोग भी इस आंदोलन में शामिल होते, तो युवा पीढ़ी केवल नौकरी की मांग नहीं, बल्कि परिवार स्थापित करने, बच्चों के भविष्य और सामाजिक न्याय की भी बात करती। दुर्भाग्य से आज युवा परिवार निर्माण की सोच ही खोते जा रहे हैं।
यह घटना हमारे समाज की गहरी बीमारी को उजागर करती है।
समस्या (रोग) की गंभीरता
व्हाट्सएप के “Locked Chats” में रात के 1 से 3 बजे तक युवाओं की भीड़ दिखती है। ग्रुप नाम जैसे “कपल टू कपल लुधियाना”, “Mam Ho to aisi 🤰”, “HOT MOM”, “Desi aunty ke chut”, “Madarsha me full chodai”, “Hot boys and uncles”, “School boy”, “पाली जोधपुर ग्रुप टॉपबटन” आदि खुलेआम अश्लीलता, स्विंगिंग, pregnancy fetish और चुदाई वाली सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं।
Blurred वीडियो, वीडियो कॉल, नंगी फोटोज और लोकेशन शेयरिंग आम हैं। यह रोग युवाओं को virtual sex addiction में डुबो रहा है, जिससे real relationships, शादी, परिवार संभालने की क्षमता और जिम्मेदारी खत्म हो रही है।
समस्या उत्पन्न होने के कर्म (कारण)
काम इच्छा मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्ति है, जो मौसम, भोजन, शारीरिक स्थिति और आंतरिक विकारों पर निर्भर करती है। गर्मी में बढ़ती है, तनाव-बेरोजगारी में उग्र हो जाती है।
संयुक्त परिवार व्यवस्था में इस काम इच्छा का समाधान आंतरिक रूप से होता था। घर की थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-दूध सब उपलब्ध रहता था। किसी को केवल सब्जी या केवल दूध की इच्छा हो तो वह अपनी जरूरत ले लेता था।
ठीक उसी प्रकार शरीर की भूख भी संयुक्त परिवार में मांग और पूर्ति के आधार पर संतुलित रहती थी। यह भूख केवल चुदाई तक सीमित नहीं थी। इसमें भावनात्मक संतुलन सबसे महत्वपूर्ण था — आलिंगन, मालिश, सहज स्पर्श, बातचीत, हंसी-मजाक, देखभाल और निकटता।
संयुक्त परिवार में सब एक छत के नीचे रहते थे, भावनात्मक भूख स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थी। जब संयुक्त परिवार टूटे, nuclear परिवार बढ़े, तब यह संतुलन बिखर गया। बेरोजगारी, loneliness, सम्मान की भूख और सुख की चाहत ने युवाओं को WhatsApp के अश्लील ग्रुप्स में धकेल दिया।
20 जून का जंतर मंतर आंदोलन इसी विकराल स्थिति का प्रतीक है — युवा सड़क पर हैं, लेकिन परिवार के साथ नहीं। वे परिवार स्थापित करने के बजाय व्यक्तिगत frustration में फंसे हैं।
समाधान से पहले महत्वपूर्ण बात
कुछ लोग तुरंत कानून का डंडा उठाने की बात करते हैं। लेकिन यह नागरिक स्वतंत्रता का हनन होगा। मानव को जिंदा रहने के लिए पेट की भूख, काम की भूख, सम्मान की भूख और सुख से रहने की चाहत — इन सबका सम्मान जरूरी है। दमन से समस्या हल नहीं होगी।
समस्या के समाधान
1. संयुक्त परिवार व्यवस्था को पुनर्जीवित करना — महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा बताई गई नियोग और दत्तक ग्रहण जैसी व्यवस्थाओं को समझदारी से अपनाकर परिवार को भावनात्मक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाएं।
2. रोजगार सृजन और आर्थिक सुरक्षा— सरकार को युवाओं के लिए सार्थक अवसर पैदा करने चाहिए, ताकि वे परिवार स्थापित करने की सोच सकें।
3. शिक्षा और जागरूकता— काम इच्छा को न दबाएं, न अनियंत्रित होने दें। ओशो की जागरूकता को समझें लेकिन open sex की निंदा करें। नैतिक शिक्षा और आत्म-नियंत्रण सिखाएं।
4. भावनात्मक समर्थन — योग, खेल, परिवार के अंदर स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को बढ़ावा दें।
5. डिजिटल साक्षरता— virtual सुख की क्षणभंगुरता समझाएं।
निष्कर्ष:
20 जून का कॉकरोच आंदोलन हमें चेतावनी दे रहा है। यदि युवा परिवार के साथ नहीं जुड़ेंगे, तो समाज की नींव ही डगमगा जाएगी। हमें संयुक्त परिवार, रोजगार और नैतिक मूल्यों को मजबूत करके ही इस रोग का समाधान करना होगा। न अंधी छूट, न अंधा दमन — संतुलित, परिवार-केंद्रित समाज ही मजबूत राष्ट्र की गारंटी है।
जय भारत।
कमलेश कुमार मित्रा
(सामाजिक चिंतक एवं अधिवक्ता)