Saturday, June 20, 2026

 परिवार व्यवस्था: प्राचीन भारतीय दृष्टि और आधुनिक चुनौतियाँ


— सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा


आज के युग में जब पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता के नाम पर भारतीय परिवार व्यवस्था तेजी से विखंडित हो रही है, तब हमें प्राचीन भारतीय ज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा की ओर लौटने की अत्यंत आवश्यकता है। “बुद्ध और ओशो : मानवीय संबंध बनाम सामाजिक संबंध” जैसे मंच इस दिशा में सकारात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करते हैं।


महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों पर आधारित परिवार व्यवस्था को समाज की मजबूत नींव माना। उन्होंने संयुक्त परिवार को सर्वोत्तम बताया, जहां वंश की निरंतरता के लिए नियोग प्रथा और दत्तक ग्रहण (adoption) को भी वैध स्थान दिया गया। यह व्यवस्था अनैतिकता नहीं, बल्कि परिवार की भावनात्मक, सामाजिक और जैविक निरंतरता सुनिश्चित करने का वैज्ञानिक तथा धार्मिक माध्यम थी।


ओशो की धारणा हमें आंतरिक जागरूकता और सजगता की ओर ले जाती है। वे संबंधों में कृत्रिम सामाजिक बंधनों की बजाय सच्ची मानवीय समझ और प्रेम पर बल देते हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता कभी भी अनियंत्रित कामुकता या परिवार-विरोधी आचरण की छूट नहीं देती। ओशो का संदेश है — दमन और अंधी परंपरा दोनों से बचते हुए, सजग और जिम्मेदार जीवन जियो।


दुर्भाग्य से, ईसाई धर्म द्वारा प्रचारित incest taboo की अति-कठोर और विकृत व्याख्या ने विश्व भर में संयुक्त परिवार व्यवस्था को तोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस taboo ने रिश्तेदारों के बीच स्वाभाविक निकटता और विश्वास को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार विखंडित हुए, nuclear families का बोलबाला हुआ और अंततः ओपन सेक्स जैसी अनियंत्रित, अनैतिक और परिवार-विनाशक संस्कृति को बढ़ावा मिला। 


पाश्चात्य समाज में extreme openness ने परिवारों को जड़ से कमजोर कर दिया है, जबकि blind suppression भी हानिकारक है। इसलिए हमें मध्य मार्ग अपनाना चाहिए — दयानंद सरस्वती की वेद-आधारित संयुक्त परिवार व्यवस्था, नियोग एवं दत्तक प्रथा को पुनर्जीवित करते हुए, ओशो की जागरूकता को अपनाते हुए। 


ओपन सेक्स को हम पूर्ण रूप से निंदनीय मानते हैं। यह न तो प्रेम है, न जिम्मेदारी, और न ही समाज या राष्ट्र के लिए हितकारी। यह केवल व्यक्तिगत भोग और परिवार के विखंडन का कारण बनता है। 


युवा पीढ़ी को जागरूक करना हमारा राष्ट्रधर्म है। आइए, हम पारिवारिक बंधनों को फिर से मजबूत करें — प्राचीन भारतीय मूल्यों को आधुनिक समझ के साथ जोड़ें, न पाश्चात्य अंधानुकरण में फंसें, न ही पुरानी रूढ़ियों में जकड़ें। सच्चा मानवीय संबंध वही है जो संयुक्त परिवार को मजबूत बनाए, संतान सुख दे और समाज को सुदृढ़ करे।


जय भारत। 


— कमलेश कुमार मित्रा 

(सामाजिक चिंतक एवं अधिवक्ता)



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