टाइटल: भारतीय समाज एवं परिवार व्यवस्था से संबंधित मूलभूत शब्दावली और सामाजिक संरचना 🙏
आज कुछ basic terms को समझ लेते हैं जो परिवार व्यवस्था से संबंधित हैं 🙏
1. व्यक्तिवाद, इंडिविजुअलिज्म :- भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि भारत में व्यक्ति बचपन से लेकर अपनी मृत्यु अवस्था तक किसी न किसी के साथ रहता है, बचपन में मां-बाप के साथ, जवानी में भाई-बहन या पत्नी के साथ, प्रौढ़ अवस्था में अपनी जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों के साथ, बुढ़ापे में अपने बच्चों और उनके बच्चों के साथ।
व्यक्तिवाद का मॉडल पूरी तरह से पश्चिमी व्यक्तिवादी है, यह मॉडल मानकर चलता है कि पैसा है तो सब कुछ खरीदा जा सकता है इसलिए व्यक्तिगत रूप से आदमी पैसे की होड़ में लगा रहता है, और कैसे भी पैसा एकत्र करके दूसरों का शोषण करना चाहता है🙏
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि व्यक्तिवाद का जहर भारत में भी फैल रहा है, परंतु फिर भी यह परिवार और संयुक्त परिवार के साथ रहते हुए अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने की कोशिश करता है जिसमें परिवार के अंदर सुप्रीमेसी स्थापित होती है, और परिवार का विखंडन बढ़ता है। इस व्यक्तिवाद को संबंधित कानून को समाप्त करना पड़ेगा। धन और काम (sex) भारतीय परिवारों की संयुक्त व्यवस्था का अंग रहा है। धन और काम का उपयोग परिवार के व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार करुणा पूर्ण ढंग से प्रदान किया जाता था, ताकि वह अपने जीवन को अच्छा बना सके और इस परंपरा को आगे बढ़ा सके। इसीलिए विवाह एक संस्कार और उत्सव के रूप में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। पश्चिमी जगत की तरह केवल चर्च के पादरी से होने से विवाह संपन्न नहीं होता, भारतीय संस्कारों में परिवार का होना विवाह के समय आवश्यक होता है, क्योंकि विवाह एक उत्सव होता है🙏
अंतिम रूप से कह सकते हैं, व्यक्तिवाद का भारतीय व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है यह एक बीमारी के रूप में कुछ महत्वाकांक्षी लोगों की मानसिकता में घर कर रहा है🙏
2. परिवार: पति-पत्नी और उनके बच्चे, परंतु इसका अस्तित्व संयुक्त परिवार के बिना नहीं है, परिवार संयुक्त परिवार का अंग होता है, और कई बार धन और काम के लिए एक मजबूत पारिवारिक व्यवस्था बनता है जो उत्सव और त्योहारों के अवसर धन और काम का सम्मिश्रण होता है, बच्चे अपनी बाल अवस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, और प्रौढ़ावस्था के अनुसार आनंद लेते हैं, संयुक्त परिवार एक शिक्षण संस्थान के रूप में आंतरिक व्यक्तियों को परंपरा से प्रशिक्षित करता रहता है/करता रहा है🙏
3. संयुक्त परिवार :- तीन पीढ़ियां तक वैवाहिक जीवन के साथ, परिवार के बच्चों के साथ, अर्थात पिता की तरफ दादा-दादी से शुरू होकर, ताऊ, चाचा, ताई, चाची, चचेरे भाई-बहन, कुंवारी बहनें, बुआ आदि तक, कई बार विवाहित बहन और विवाहित बुआ लोग भी परिवार के साथ रहने लगते हैं, उनको संयुक्त परिवार का अंग ही माना जाता है, परंतु उसे नातेदारी के अंतर्गत भी लिया जाता है🙏
4. नातेदारी :- जब परिवार की स्त्रियां विवाह करके दूसरे परिवार से जुड़ जाती हैं, और वहां पर पृथक रूप से बच्चे उत्पन्न करती हैं तो वह सभी नातेदार कहलाते हैं, परंतु ऐसी नातेदारी, जो माता की ओर तीन पीढ़ी तक, और पिता की ओर सात पीढ़ी तक रही हो, उसके अंदर ही विवाह संबंध किए गए हो, तो इसे कुल कहा जाता है 🙏
5. कुल/कुलीनता :- पिता की ओर सात पीढ़ी तक और माता की ओर तीन पीढ़ी तक कुल माना जाता है, कई बार इस संबंध नातेदारी से आ जाते हैं, लंबे समय में यह कुल का अंग ही माने जाने लगते हैं, यहीं से जाति का उदय हो जाता है🙏
6. जाति :- जाति एक ओर जैविक संबंध की तरफ इशारा करती है दूसरी तरफ आर्थिक संसाधनों को प्राप्त करने के काम से भी जोड़ती है, अर्थात धन/अर्थ और काम की समानता आधार पर जातियां जड़ रूप में स्थापित हुई हैं, समान कार्य करने वाली के साथ विवाह के रूप में शारीरिक संबंध स्थापित करना, अर्थात कई कुलों का आपस में जुड़ना जाति व्यवस्था को परिष्कृत करता है, विस्तारित करता है🙏
7. समाज :- जातियों के आंतरिक संबंध जो अर्थ और काम पर आधारित हैं जब अन्य जातियों के साथ आदान-प्रदान करते हैं, जिसे व्यापारिक संबंध कह सकते हैं, मुख्यतः अर्थ पर निर्भर होते हैं, आदान-प्रदान होता है। श्रम के क्रय-विक्रय पर आधारित होता है, श्रम का क्रय-विक्रय : मांग-पूर्ति की मजबूरी और शासन की लापरवाही अथवा झुकाव के कारण कुछ जातियों के पक्ष में, उनके श्रम को अधिक मूल्य देता है, दूसरे के श्रम को कम मूल्य देता है आर्थिक असंतुलन पैदा करता है🙏
8. सामाजिक अंतर्विरोध :- जब दो जातियों में आर्थिक असंतुलन को लेकर संघर्ष आरंभ होता है, किसी के श्रम को अधिक मूल्य और किसी के श्रम को कम मूल्य दिया जाता है, विद्रोह का कारण बनता है, विद्रोह बाहरी शक्तियों का आमंत्रण करता है, ताकि वह संतुलन की अवस्था में आ सके 🙏
9. विद्रोह और संघर्ष:- विद्रोह जब संघर्ष का रूप ले लेता है, तो जिस अन्य समाज से उसको सहयोग प्राप्त होता है उसके प्रति ऋणी हो जाता है, यदि उसे समाज का जिससे विद्रोही ने सहायता प्राप्त की है, एक कुशल नेतृत्व है तो वह राज्य के रूप में स्थापित होता है, और यदि यह विद्रोही सफलता प्राप्त करता है, तो एक राज्य के रूप में स्थापित हो जाता है, और इस प्रकार समाज में दो अलग-अलग राज्य स्थापित हो जाते हैं🙏
10. राज्यों के अंदर पुनः महत्वाकांक्षी और व्यक्तिवादी सोच के लोग पैदा होने लगते हैं, वह अधिक से अधिक धन अर्जित कर लेना चाहते हैं, इस तरह से पूंजीवाद का उदय राज्य के अंदर होने लगता है, और यह पूंजीवादी लोग राज्य को प्रभावित करने लगते हैं क्योंकि यह स्वयं राज्य से उत्पन्न होते हैं, पीढ़ियों के अंतराल बाद पूंजीवाद स्थाई रूप ले लेता है, राज्य उनके अनुसार कार्य नहीं करता तो यह पूंजीवादी लोग जनता का शोषण बढ़ा देते हैं, और राज्य में विद्रोह शुरू हो जाता है, राज्य की स्थिरता अथवा स्थिरता की चाबी इन पूंजीवादी लोगों के पास आ जाती है इसलिए राजनीति में अस्थिर लोग पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद का आंदोलन चलाते हैं परंतु उनके अंतर चित्त में कहीं ना कहीं व्यक्तिवाद बना रहता है, और नेता के रूप में स्थापित होकर अपनी ही जय कराते रहते हैं🙏
11. समाजवाद और पूंजीवाद का संघर्ष: आजकल पूरे विश्व में देखा जा रहा है इस पर अलग से चर्चा करेंगे🙏
सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा 🙏
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