भारतीय संविधान की मूल भावना : आर्थिक समानता और मानवता की नई प्रतियोगिता
— सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा
भारतीय संविधान की उद्देशिका में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ समता (समानता) का गहरा आह्वान है। संविधान की मूल भावना स्पष्ट है — जन्म से किसी को भी विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए।
जन्म पर आधारित शिक्षा का एकाधिकार महात्मा ज्योतिराव फूले जी ने तोड़ दिया 😂
जन्म पर आधारित राजा होने का एकाधिकार डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने तोड़ दिया 😂
अब जन्म पर आधारित लाला होने का एकाधिकार कमलेश मित्रा समाप्त करेंगे 🙏
राजा पेट से नहीं होता, तो लाला भी पेट से नहीं होना चाहिए।
जिस प्रकार किसी मातहत्वपूर्ण संगठन का बड़ा पुजारी होना अब किसी जाति विशेष का अधिकार नहीं रहा, और राजा होने का विशेष परिवार का अधिकार समाप्त हो चुका है, उसी प्रकार लाला होने का एकाधिकार भी समाप्त होना चाहिए।
जिस प्रकार किसी सांसद या विधायक की मृत्यु के बाद उनका पद स्वतः परिवार के सदस्य को नहीं जाता और उन्हें जनता के बीच जाकर पुनः संघर्ष करना पड़ता है, उसी प्रकार किसी फैक्ट्री, कंपनी या फर्म के प्रमुख की मृत्यु के बाद उनका पद और संपूर्ण संपत्ति परिवार को नहीं जानी चाहिए। वह संपत्ति आम जनता के श्रम के शोषण से अर्जित की जाती है। इसलिए किसी भी लाला की मृत्यु के पश्चात उसकी संपूर्ण संपत्ति अनिवार्य रूप से राज्य में समाहित कर दी जानी चाहिए। यही आर्थिक समानता का सच्चा मार्ग है और संविधान की मूल भावना है।
जन्म आधारित किसी भी प्रकार के उत्तराधिकार में योग्यता के फलीभूत होने के अवसर समाप्त हो जाते हैं। पंडित का बेटा बिना ज्ञान-भक्ति के पंडित बन जाता है। फूले जी ने इस मिथक को तोड़ा, जिससे अंबेडकर जैसी प्रतिभा उभरी। अंबेडकर जी ने जन्म से राजा होने के मिथक को तोड़ा, इसलिए नेहरू और पटेल जैसे नेता उभरे जिन्होंने भारत को सुसंगठित किया।
अब फुले-अंबेडकर के क्रांतिकारी कार्य को आगे बढ़ाते हुए हम जन्म पर आधारित लाला होने के मिथक को तोड़ेंगे। तभी वास्तविक प्रतिभाओं का उदय होगा। भारत फिर से सोने की चिड़िया बनेगा और विश्व गुरु बनेगा। हर व्यक्ति को अपनी योग्यता के अनुसार कार्य करने का पूरा मौका मिलेगा। व्यक्ति केवल धन कमाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी योग्यता के विकास और दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करेगा।
एक के श्रम का मूल्य अधिक और दूसरे के श्रम का मूल्य कम करके आंकने की प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए। संविधान में सामाजिक न्याय की बात की गई है, इसलिए हर व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए प्रयास करना चाहिए। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति ही अमर होते हैं। धन का शोषण-आधारित संग्रह पुरानी प्रथा है। अब नए भारत का उदय होना चाहिए।
प्रतियोगिता का रूप बदलना होगा:— युद्ध के हथियार खरीदने या धन जमा करने की नहीं, बल्कि मानवता की प्रतियोगिता होनी चाहिए। केवल राजनीतिक नेता नहीं, सामाजिक नेता बनने की होड़ होनी चाहिए। दूसरों का कल्याण ही सबसे बड़ी पूंजी हो।
वर्तमान बीजेपी सरकार: राजनीतिक क्षेत्र में डायनेस्टी को बढ़ावा देकर संविधान की मूल भावना का उल्लंघन कर रही है। नेता बिना जनता के बीच गए, बिना योग्यता के अपने पुत्रों को सीधे संसद और राज्यसभा भेज रहे हैं। यह प्रथा संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है और अत्यंत चिंताजनक है।
हमारा यह चिंतन-परख: संविधान की उद्देशिका को साकार करने की दिशा में एक पुकार है। आओ, जन्म-आधारित सभी विशेषाधिकार समाप्त करें, आर्थिक समानता स्थापित करें और मानवता की नई प्रतियोगिता प्रारंभ करें।
जय संविधान। जय समता। जय मानवता।🙏
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